सोमवार, 3 सितंबर 2018
प्रेरक कहानी प्रस्तुति कैलाश संकलेचा
मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016
Kavya Ke prashna
वास्तविक काव्यलक्षण का प्रारंभ किस आचार्य से होता है जिन्होंने शब्द और अर्थ के सहभाव (शब्दार्थोसहितौ काव्यम् ) को काव्य की संज्ञा दी है --> भामह से
शब्द अर्थ संगम सहित भरे चमत्कृत भाय।
जग अद्भुत में अद्भुतहिँ , सुखदा काव्य बनाए ॥
पंक्ति है --> ग्वाल कवि (रसिकानंद)
प्रतिभा के दो भेद (सहजा और उत्पाद्या ) किसने किये --> रुद्रट ने
प्रतिभा को काव्य निर्माण का एकमात्र हेतु मानने के कारण किस आचार्य के प्रतिभावादी कहा जाता है --> पंडितराज जगन्नाथ को
प्रतिभा के दो भेद 'कारयित्री' और 'भावयित्री' किस आचार्य ने किए हैं -->
राजशेखर ने
भावयित्री प्रतिभा किसमे होती है -->
सहृदय में
भारतीय काव्यशात्र में 'भावक' से अभिप्राय है? --> सहृदय या आलोचक से
"शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली" कथन किसका है--> दण्डी का
रीति सिद्धांत की उपलब्धि है --> शैली तत्वों को महत्व देना
वामन के अनुसार गुण और रिति का संबंध है -->
अभेद
आचार्य कुंतक के अनुसार वक्रोक्ति के कितने भेद हैे --> 6
वक्रोक्ति सिद्धांत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है--> कलावाद की प्रतिष्ठा
कवः कर्म काव्यम् , (कवि का कर्म ही काव्य है ) कथन किसका है --> कुन्तक का
औचित्य विचार चर्चा , ग्रंथ किस आचार्य का है --> क्षेमेंद्र का
क्षेमेंद्र के अनुसार औचित्य के प्रधान भेद हैं--> 27
क्षेमेंद्र ने रस का प्राण किसे माना है -->
औचित्य को
ध्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' किसने लिखी --> अभिनवगुप्त ने
ध्वनि सिद्धांत का प्रादुर्भाव व्याकरण के स्पोट सिद्धांत से हुआ है
वैयाकरण ने वाक् (वाणी) के कितने प्रकार माने है?--> 4
१• परा, 2• पश्यंती, ३• मध्यम, ४• बैखरी
आनन्दवर्धन का समय है --> नवीं शती का मध्य
आनन्दवर्धन ने व्यंग्यार्थ के तारतम्य के आधार पर काव्य के कितने भेद किये है--> 3 ; ध्वनि, गुणिभूत व्यंग, चित्र
आनन्दवर्धन ने ध्वनि के कितने प्रकार माने है-->
3 ; वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि,रसध्वनि
आनंद वर्धन के अनुसार रीति के चार नियामक है --> वक्त्रोचित्य , वाच्योचित्य , विषयोचित्य , रसोचित्य
अभिनव गुप्त ने ध्वनि के कितने भेद किए हैं --> 35
मम्मट ने के ध्वनि के शुद्ध भेदों की संख्या स्वीकार की है --> 51
पंडित राज जगन्नाथ काव्य के कितने भेद किए हैं --> 4
उत्तमोत्तम--> उत्तम--> मध्यम--> अधम
आचार्यो ने व्यंग्यार्थ की प्रधानता गौणता एवं अभाव के आधार पर काव्य के कितने भेद किए हैं --> 3 ; उत्तम --> मध्यम--> अधम
आधुनिक काल के प्रारंभिक समय में से सेठ कन्हैयालाल पौद्दार ने काव्यकल्पद्रुम नामक ग्रंथ की रचना की जो आगे चलकर रसमंजरी और अलंकार मंजरी के रुप में प्रकाशित हुआ
हृदयदर्पण नामक ग्रंथ की रचना किसने की -->
भट्टनायक ने
हिंदी वक्रोक्ति जीवित की भूमिका किसने लिखी --> नगेंद्र ने
रस निरुपण के प्रथम व्याख्याता और रस निरुपण का प्रथम ग्रंथ किसे माना जाता है --> भरत मुनि व उनके नाट्यशास्त्र को
भरत ने 8 स्थाई भाव , 8 सात्विक भाव, 33 संचारी भावों का उल्लेख किया है
किस आचार्य ने रीती को काव्य की आत्मा मान कर रस के गुण के अंतर्गत स्थान दिया है और कांति गुण का वर्णन करते हुए रस से युक्त माना है --> वामन
आचार्य रुद्रट ने शांत रस का स्थाई भाव किसे माना है --> समयक ज्ञान
रस को ध्वनि के साथ युक्त करने का श्रेय किसे है --> आनंद वर्धन को
भोज ने 12 रसों का विवेचन किया है जिनमें चार नवीन है --> प्रेयस--> शांत--> उदात्त-->
उध्दात
भोज ने रस का मूल किसे माना है--> अहंकार को
वाक्य रसात्मक काव्यम् कथन किसका है -->
विश्वनाथ का
आचार्य शुक्ल ने काव्य की आत्मा किसे माना है--> रस को
भट्टलोल्लक ने रस की अवस्थिति किसमें मानी है--> अनुकार्य में
किस आचार्य ने रस सूत्र की व्याख्या के संधर्भ में काव्य में तीन शक्तियों की कल्पना की (अभिधा, भावक्त्व, भोजकत्व) -->भट्टनायक ने
अभिनव गुप्त रस को मानते हैं --> व्यंग
किस आलोचक के मतानुसार साधारणीकरण कवि की अनुभूति का होता है --> नगेंद्र के अनुसार
भारतीय काव्यशास्त्र में भावक से अभिप्राय है --> सहृदय या आलोचक से
भावक(सहदय्) के कितने प्रकार माने गए है --> 4
१ अरोचकी [विवेकी], २ सतृणाभ्यव्हारि [अविवेकी], ३ मत्सरी [पक्षपात पूर्ण आलोचना करने वाला], ४ तत्त्वाभिनिवेशी
विभाव के कितने भेद हैं --> 2[आलम्बन और उद्दीपन ]
आलंबन विभाव के कितने भेद हैं --> 2 ; १•आलंबन २•आश्रय
सात्विक अनुभाव की संख्या कितनी मानी गई है --> आठ
आचार्य शुक्ल ने विरोध और अविरोध के आधार पर संचारियों के कितने वर्ग किये हैं --> चार ;
१• सुखात्मक २• दु:खात्मक ३• उभयात्मक ४• उदासीन
श्रृंगार को मूल रस किस आचार्य ने माना है-->
भामह ने
भक्ति रस का रस को मूल रास किसने माना है--> मधुसूदन सरस्वती एव रूप गोस्वामी ने
शंकुक के अनुसार भरतमुनि के रस सूत्र में आये “संयोग ” शब्द का अर्थ है --> अनुमान
रस सिद्धांत के संबंध में तन्मयतावाद के प्रतिष्ठापक है--> अभिनव भरत
एक के बाद एनी अनेक भावों का उदय होता है तो उसे कहते है --> भाव सबलता
अवहित्था और अपस्मार क्या है ?--> संचारी भाव का एक प्रकार
किस आलोचक के मतानुसार साधारणीकरण कवि भावना का होता है --> नगेंद्र
अभिधा, भावकत्व और भोग काव्य के तीन व्यापार किस आचार्य ने माने हैं --> भट्टनायक ने
भाव-सन्धि, भाव सबलता तथा भाव-शांति किस भाव की प्रमुख स्थितियां है --> संचारी भाव की
अलंकार संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य है -->
भामह
भरत मुनि ने कितने अलंकारों का उल्लेख किया है ? --> 4
१• उपमा २• रूपक ३• दीपक ४• यमक
अलंकार रत्नाकर नामक ग्रंथ के रचयिता है -->
शोभाकर मित्र
दण्डी ने गुणों की संख्या कितनी मानी है -->
10
आचार्य भोज ने अनुसार गुणों की संख्या है -->
24
वामन ने गुणों की संख्या मानी है --> 20
मम्मट, भामह तथा आनंद वर्धन ने गुणों के भेद माने है --> 3
गुणों के प्रमुख भेद है --> 3
१• माधुर्य, १• औज, ३• प्रसाद
वृत्ति का सर्वप्रथम वर्णन किस ग्रंथ में मिलता है--> नाट्यशास्त्र में
भारतीय काव्यशास्त्र में कितनी काव्य वृत्तियां मानी ग मानी गई है --> 3
१• परुषा
२• कोमल
३• उपनागरी
सर्वप्रथम दोष की परिभाषा किस आचार्य ने प्रस्तुत की--> वामन ने
दंडी में कितने काव्य दोषों का वर्णन किया है --> 10
वामन ने कितने काव्य दोषों का वर्णन किया है --> 20
विश्वनाथ ने कितने दोषों का वर्णन किया है --> 70
काव्य दोषो का सर्वप्रथम निरुपण किस ग्रंथ में मिलता है --> भारत कृत नाट्य शास्त्र में
दस के स्थान पर तीन काव्य गुणों की स्वीकृति प्रथम किस आचार्य ने की--> भामह ने
प्रेयान नामक नवीन रस की उद्भावना किस आचार्य ने की।--> रुद्रट
आलोक का हिंदी भाष्य किसने लिखा-->
आचार्य विश्वेश्वर ने
भावप्रकाश नामक ग्रंथ के रचयिता है-->
शारदातनय
दण्डी ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3
१• नैेसर्गिकी प्रतिभा
२• निर्मल शास्त्र ज्ञान
३• अमंद अभियोग [अभ्यास]
रुद्रट और कुंतक ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3
१• शक्ति, २•व्युत्तपत्ति, ३• अभ्यास
वामन ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3
१• लोक, २• विद्या , ३• प्रकीर्ण
व्यंग के तारत्मय के आधार पर काव्य के कितने भेद माने जाते है --> 3
१•ध्वनि, २• गुणीभूत व्यंगचित्र, ३• चित्र
काव्यरुप(इंद्रियगम्यता) के आधार पर काव्य के कितने भेद है --> 2
१• दृश्य काव्य, २•श्रव्यकाव्य
दृश्यकाव्य[ रूपक] के कितने प्रमुख भेद है --> 10
श्रव्यकाव्य के कितने भेद हैं --> 3
१•गद्य, •२ पद्य ,३ चंपू [ गद्य-पद्यमय काव्य]
लक्षणा के कुल कितने भेद माने जाते हैं --> 12
किस लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते है-->
रूढ़ि लक्षणा को
किस आचार्य ने लक्षणा के 80 भेदों का उल्लेख किया है --> विश्वनाथ ने
मम्मट ने लक्षणा के कितने भेदों का उल्लेख किया है --> 12
किस काव्य को चित्रकाव्य कहा जाता है -->
अधम काव्य को
बंध के आधार पर काव्य के कितने भेद हैं --> 2 ( १• प्रबंध २• मुक्त्तक)
पूर्वापर सम्बन्ध निरपेक्ष काव्य -रचना को कहते हैं--> मुक्त्तक
पूर्वापर सम्बन्ध निर्वाह -सापेक्ष रचना को कहते है --> प्रबंध
संस्कृत में साहित्य के लिए किस शब्द का प्रयोग होता है --> वाङ्मय
तात्पर्य, क्या है --> अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति
भामह 'अभाववादी' कहलाते है क्योंकि -->
उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है
प्रतिभा मात्र को ही काव्य का हेतु आवश्यक सर्वप्रथम किसने माना --> हेमचंद्र ने
गुणिभूत व्यंग के कितने भेद होते हैं --> 8
वाच्यता असह,का अन्य नाम है --> रस ध्वनि
भरत ने हास्य रस के कितने भेद माने हैं --> 6
कुंतक ने वक्रोति के भेद व उपभेद माने है --> 6 भेद व 41 उपभेद
हेतुर्न तु हेतव:’ पंक्ति है--> मम्मट की
जनश्रुति के आधार पर किस आचार्य कोरस के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया जाता है -->
नंदिकेश्वर को
भरत के नाट्यशास्त्र में भावों की संख्या 49 गिनाई है -->
१• स्थाई भाव--> 8
२• व्याभिचारी भाव--> 33
३• सात्विक भाव--> 8
8+33+8--> 49
आचार्य भामह ने काव्य हेतु किसे माना है -->
प्रतिभा को
किस आचार्य का कथन है कि संसार में जो कुछ पवित्र उज्जवल एव दर्शनीय है ,वह श्रृंगार के भीतर समाविष्ट हो सकता --> भरत मुनि
श्रृंगार रस को रसराज माना जाता हैे -->
कार्य -व्यापार की व्यापकता के कारण
भरत मुनि के रस सूत्र के प्रथम व्याख्याता भटलोल्लट के रस- विवेचन का सैद्धांतिक आधार है --> मीमांसा
रस को दो वर्गो (सुखकारक व दुःख कारक )में बाँटकार किन आचार्य ने करुण ,भयानक,वीभत्स और रौद्र को दुःखकारक तथा शेष को सुख का कारक माना --> रामचंद्र एव गुणचन्द्र ने
नवरस नामक ग्रंथ के लेखक हे --> बाबू गुलामराय
'रस कलश' नामक ग्रंथ के लिए के लेखक है-->
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
सर्वप्रथम किस आचार्य ने रस को काव्य आत्मा घोषित किया--> विश्वनाथ
रुद्रट तथा कुंतक ने काव्य-हेतुओं की संख्या मानी है--> 3
१• शक्ति, २•व्युत्पत्ति ”३•अभ्यास
राज शेखर ने रस का प्रतिष्ठाता किसे माना है --> नंदीकेश्वर को
भरत मुनि ने कितने रस, कितने गुण, कितने दोष तथा कितने अलंकारों का उल्लेख किया है -->
रस--> 8, गुण--> 10, दोष--> 20, अलंकार--> 4
शब्दार्थो सहित काव्यम् , काव्य काव्य की इस परिभाषा में दोष है--> अतिव्याप्ति
प्रेयान नामक नवीन रस की उद्भावना किस आचार्य ने की।--> रुद्रट
आलोक का हिंदी भाष्य किसने लिखा-->
आचार्य विश्वेश्वर ने
भावप्रकाश नामक ग्रंथ के रचयिता है-->
शारदातनय
दण्डी ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3
१• नैेसर्गिकी प्रतिभा
२• निर्मल शास्त्र ज्ञान
३•अमंद अभियोग[अभ्यास]
रुद्रट और कुंतक ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3
१•शक्ति
२•व्युत्तपत्ति
३• अभ्यास
वामन ने कितने काव्य हेतु माने है --> 3
१• लोक,
२•विद्या ,
३•प्रकीर्ण
व्यंग के तारत्मय के आधार पर काव्य के कितने भेद माने जाते है --> 3
१• ध्वनि,
२• गुणीभूत व्यंगचित्र ,
३• चित्र
काव्यरुप(इंद्रियगम्यता) के आधार पर काव्य के कितने भेद है --> 2
१• दृश्य काव्य,
२• श्रव्यकाव्य
दृश्यकाव्य[ रूपक] के कितने प्रमुख भेद है --> 10
श्रव्यकाव्य के कितने भेद हैं --> 3
१• गद्य,
२. पद्य ,
३. चंपू [गद्य-पद्यमय काव्य]
लक्षणा के कुल कितने भेद माने जाते हैं --> 12
किस लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते है-->
रूढ़ि लक्षणा को
किस आचार्य ने लक्षणा के 80 भेदों का उल्लेख किया है --> विश्वनाथ ने
मम्मट ने लक्षणा के कितने भेदों का उल्लेख किया है --> 12
किस काव्य को चित्रकाव्य कहा जाता है -->
अधम काव्य को
बंध के आधार पर काव्य के कितने भेद हैं --> 2
१• प्रबंध,
२• मुक्त्तक
पूर्वापर सम्बन्ध निरपेक्ष काव्य -रचना को कहते हैं--> मुक्त्तक
पूर्वापर सम्बन्ध निर्वाह -सापेक्ष रचना को कहते है --> प्रबंध
संस्कृत में साहित्य के लिए किस शब्द का प्रयोग होता है --> वाङ्मय
'तात्पर्य' क्या है --> अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति
भामह 'अभाववादी' कहलाते है क्योंकि -->
उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है
प्रतिभा मात्र को ही काव्य का हेतु आवश्यक सर्वप्रथम किसने माना --> हेमचंद्र ने
गुणिभूत व्यंग के कितने भेद होते हैं --> 8
वाच्यता असह, का अन्य नाम है --> रस ध्वनि
भरत ने हास्य रस के कितने भेद माने हैं --> 6
कुंतक ने वक्रोति के भेद व उपभेद माने है --> 6 भेद , व 41 उपभेद
'हेतुर्न तु हेतव:' पंक्ति है--> मम्मट की
जनश्रुति के आधार पर किस आचार्य कोरस के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया जाता है -->
सोमवार, 21 दिसंबर 2015
Moun ekadashi, moun gyaras, मौन एकादशी की विधि
मौन एकादशी विशेष
आज मौन एकादशी है। जैन दर्शन में एक बहुत शुभ व मंगलकारी पर्व जिसे मौन एकादशी( मौन ग्यारस ) कहते हैं।यह पर्व मिगसर माह के ग्यारहवें दिन अर्थात मिगसर सुदी ग्यारस को मनाया जाता है। इस दिन एकादशी व्रत पर मौन रहने का महत्व है। वर्ष में एक बार आने वाली मौन एकादशी का व्रत पापों से मुक्ति दिलाता है। कर्म क्षय करने का यह मुख्य दिन है। इस दिन जैन उपाश्रय, स्थानकों आदि पर विशेष धर्म आराधनाएं होती हैं। इस दिन जो भी धार्मिक क्रिया करेंगे उसका 150 गुणा फल प्राप्त होगा।
आज के दिन अर्थात मौन एकादशी को की जाने वाली धर्म आराधनाएं -
1) मौन धारण के साथ पौषध व्रत
2) 12 लोगस्स का कायोत्सर्ग
3) 12 खमासणा
4) 12 स्वास्तिक
5) इस जप पद की 20 नवकारवाली
" ॐ ह्रीं श्रीं मल्लिनाथ सर्वज्ञाय नमः"
**मौन एकादशी से जुडी विशेष जानकारी**
श्री नेमिनाथ भगवान और कृष्णवासुदेव
एक समय श्री नेमिनाथ भगवान द्वारिका नगरी पधारे।जब कृष्णवासुदेव ने प्रभु के आगमन के समाचार सुने तो वे उनके दर्शनार्थ हेतु उनके समवसरण में गए।उनकी धर्म देशना सुनने के बाद कृष्ण ने उन्हें वंदन नमन किया व उनसे प्रश्न किया, " हे प्रभु ! राजा होने के नाते राज्य की बहुत सारे कर्तव्यों के चलते मैं किस प्रकार अपनी धार्मिक क्रियायों को आगे तक करता रहूँ ? कृपया मुझे पुरे वर्ष में कोई एक ऐसा दिन बताएं जब कोई कम प्रत्याख्यान व्रतादि के बाद भी अधिकतम फल को प्राप्त कर सके ?"
यह सुनकर श्री नेमिनाथ बोले, " हे कृष्ण, यदि तुम्हारी इस प्रकार की इच्छा है तो तुम मगसर माह के ग्यारहवें दिन ( एकादशी अर्थात मगसर सुदी ग्यारस ) को इस दिन से जुडी सभी धार्मिक क्रियाओं को पूर्ण करो।" प्रभु ने इस दिन की विशेषतायें भी समझाईं।
मौन एकादशी की विशेषतायें
एकादशी के इस दिन
1) श्री अरनाथ भगवान ( 18वें तीर्थंकर ) ने सांसारिक जीवन त्यागकर दीक्षा अंगीकार कर साधूत्व अपनाया।
2) श्री मल्लिनाथ भगवान ( 19वें तीर्थंकर ) का जन्म हुआ, संसार त्यागकर दीक्षा अंगीकार की व केवल ज्ञान प्राप्त किया।
3) श्री नेमिनाथ भगवान ( 22 वें तीर्थंकर ) ने केवल ज्ञान प्राप्त किया।
इस प्रकार तीन तीर्थंकरों के 5 कल्याणक इस दिन मनाये जाते हैं।
भरतक्षेत्र व ऐरावत क्षेत्र में भी चौबीसीयां होती हैं, वहां भी 5 कल्याणक होते हैं।इस तरह 5 भरतक्षेत्र में (5 × 5 = 25 )कल्याणक व 5 ऐरावत क्षेत्र में ( 5 × 5 = 25 )कल्याणक होते हैं। अर्थात भूतकाल, वर्तमान काल व भविष्य काल की चौबीसियों से सभी क्षेत्रों में 50 कल्याणक से कुल 150कल्याणक मिलते हैं।
यह सुनकर कृष्ण ने जिज्ञासावश पूछा, "भगवन, कृपया मुझे बताइये के भूतकाल में किसने इस दिन की पूजा की व इसके फलों को प्राप्त किया ?"
तब प्रभु नेमिनाथ ने सुव्रत सेठ का उदाहरण दिया जिसने इस दिन पूरी परायणता से, भक्ति से धार्मिक क्रियाओं का अनुसरण करके प्रतिज्ञा पूर्ण की और मोक्ष प्राप्त किया।
सुव्रत सेठ की कथा
विजयपाटन नामक नगर के घातकीखंड जिले में सुर नामक व्यापारी रहता था। उस राज्य का राजा सुर का बहुत आदर करता था व उसे बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति समझता था।एक रात्रि, शांतिपूर्वक सोते हुए वह मध्यरात्रि के प्रारंभकाल में जागा, तभी उस पर एक अलौकिक प्रकाश पड़ा व उसे दृष्टान्त हुआ की वह अपने पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों की वजह से इस जन्म में प्रसन्नतापूर्वक संपन्नता से रह रहा है। इसलिए अगले जन्म में सम्पन्नता से जीने के लिए उसे इस जन्म में कुछ फलदायक करना पड़ेगा क्योंकि इसके बिना सब निरर्थक है। सूर्योदय के बाद शीघ्र ही वह अपने गुरु से मिलने गया और उनके उपदेश को सुनकर वह बहुत प्रभावित हुआ व गुरु से पूछा, "हे गुरुदेव ! जिस तरह का कार्य मैं करता हूँ, यह संभव नहीं की मैं नित्य पूजा पाठ व अन्य धार्मिक क्रियाएँ कर सकूँ।यदि आप कृपा करके मुझे कोई एक दिन बताएँ जिस दिन मैं अपनी सब धार्मिक क्रियाएँ कर सकूँ और उनके अधिकतम फल( पुण्य ) प्राप्त कर सकूँ ?"
तब गुरुदेव बोले, " मगसर माह के ग्यारहवें दिन अर्थात मिगसर सुदी ग्यारस को तुम 11 वर्ष और 11 महीने तक लगातार मौन रखकर पौषध रुप में व्रत करो।यह प्रण पूर्ण करने के बाद तुम हर्षोल्लास से मना सकते हो।" यह सुनकर उसने अपने परिवार के सदस्यों के साथ कथित काल तक पूरी भक्ति से एकादशी का व्रत किया। तपस्या पूर्ण होने के 15 दिन बाद उसकी मृत्यु हो गयी और वह 11वें स्वर्ग( देवलोक ) में गया।वहाँ 21 सागरोपम की आयु पूर्ण करने के पश्चात उसने भरतक्षेत्र के सौरीपुर नामक नगर के सेठ समृद्धिदत के पुत्र के रूप में जन्म लिया।उसके पिता द्वारा उसे सुव्रत नाम मिला। जब उसे ज्ञान हुआ की एकादशी के दिन की पूजा करने के कारण उसे यह सुन्दर जीवन मिला है व वह 11वें देवलोक में गया था, उसने अपनी 11 पत्नियों के साथ एकादशी का प्रण लिया।उसकी सब पत्नियों ने केवलज्ञान प्राप्त किया व मोक्षगमन किया।कुछ समय बाद ही राजा सुव्रत ने भी तपस्या करते हुए केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। देवलोक के सभी देवताओं ने उनका यह मुक्ति दिवस मनाया।तब फिर उन्होंने कमल पर विराजित होकर अपने शिष्यों को उपदेश दिए। कुछ वर्षों बाद उन्होंने भी मोक्ष प्राप्त कर लिया।
इस तरह, भगवान नेमिनाथ ने कृष्णवासुदेव को यह कथा बताई और उसके बाद कृष्ण वासुदेव व उनके समस्त राज्य ने इस सम्यक्त्व राह को अनुगमन करने का निर्णय किया।
गुरुवार, 10 सितंबर 2015
Mata Trishla Julave Putra Parne re, mata+trishla+julave+putra+parne+re
Halarda, haalriya, haalriya, palna geet, song,
माता त्रिशला ज़ुलावे पुत्र पारणे....,
गावे हालो हालो हालरवाना गीत,
सोना-रुपाने वळी रतने जडियु पारणु...
रेशम दोरी घुघरी वागे छुम छुम रित...
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....1
जिनजी पार्श्व प्रभुथी वरश अढीसे अंतरे,
होंसे चोविसमो तीर्थंकर जिन परिमाण,
केशी स्वामी मुखथी एवी वाणी सांभळी,
साची साची हुई ते म्हारे अमृत वाण.....
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....2
चौदे स्वप्ने होवे चक्रि के जिनराज,
वित्या बारे चक्री नही हवे चक्रिराज,
जिनजी पार्श्व प्रभुना श्री केशी गणधार,
तेहने वचने जाण्या चोविसमा जिनराज,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....3
म्हारी कुखे आव्या त्रण भुवन शिरताज,
म्हारी कुखे आव्या तारण तरण जहाज,
म्हारी कुखे आव्या संघ तीरथनी लाज,
हु तो पुण्य पनोती इंद्राणी थई आज,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....4
मुजने दोहलो उपन्यो बेसु गज अंबाडिये,
सिंहासन पर बेसु चामर छत्र धराय,
ते सहु लक्षण मुजने नंदन त्हारा तेजना,
ते दिन संभारुने आनंद अंग न माय,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....5
करतल पगतल लक्षण एक हजार ने आठ छे,
तेहथी निश्चय जाण्या जिनवर श्री जगदीश,
नंदन जमणी जांघे लांछन सिंह बिराजतो,
में तो पहेले स्वप्ने दिठो विसवावीस,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....6
नंदन नवला बांधव नंदिवर्धनना तमे,
नंदन भोजाईओना दियर छो सुकुमाल,
हससे भोजाईओ कही दियर म्हारा लाडका,
हससे रमशेने वळी चुंटी खणशे गाल,
हससे रमशेने वळी ठुंसा देशे गाल,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....7
नंदन नवला चेडा राजाना भाणेज छो,
नंदन नवला पांचसे मामीना भाणेज छो,
नंदन मामलियाना भाणेजा सुकुमाल,
हससे हाथे उच्छाळी कही नाना भाणेजडा,
आंख्यु आंजीने वळी टपकु करशे गाल,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....8
नंदन मामा मामी लावशे टोपी अंगला,
रतने जडिया जालर मोती कसबी कोर,
निला पिलाने वळी राता सर्वे जाती ना,
पहेरावशे मामी म्हारा नंद किशोर,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....9
नंदन मामा मामी सुखलडी बहु लावशे,
नंदन गजुवे भरशे लाडु मोती चूर,
नंदन मुखड़ा जोईने लेशे मामी भामणा,
नंदन मामी कहेशे जीवो सुख भरपूर,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....10
नंदन नवला चेडा राजानी साते सती,
म्हारी भत्रीजी ने बहेन तमारी नंद,
ते पण गजुवे भरवा लाखण श्याही लावशे,
तुमने जोई जोई होशे अधिको परमानंद,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....11
रमवा काजे लावशे लाख टकानो घुघरो,
वळी सुडा मेना पोपटने गजराज,
सारस कोयल हंस तितरने वळी मोरजी,
मामी लावशे रमवा नंद तमारे काज,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....12
छप्पन कुमरी अमरी जळ कळशे न्हवराविया,
नंदन तमने अमने केली घरनी मांही,
फुलनी वृष्टि किधी योजन एकने मांडले,
बहु चिरंजीवो आशीष दिधी तुमने त्यांही,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....13
तमने मेरूगिरी पर सुरपति ऐ न्हवरावीया,
निरखी निरखी हरखी सुकृत लाभ कमाय,
मुखड़ा ऊपर वारु कोटि कोटि चंद्रमा,
वळी तन पर वारु ग्रहगणनो समुदाय,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....14
नंदन नवला भणवा निशाळे पण मुकशु,
गज पर अंबाड़ी बेसाड़ी म्होटे साज,
पसली भरशु श्रीफळ फोफळ नागर वेलशु,
सुखलडी लेशु निशाळीयाने काज,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....15
नंदन नवला म्होटा थाशोने परणावशु,
वर-वहु सरखी जोड़ी लावशु राजकुमार
सरखे सरखा वेवाई वेवणने पधरावशु,
वर-वहु पोंखी लेशु जोई जोईने देदार,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....16
पियर सासर म्हारा बेऊ पख नंदन उजळा,
म्हारी कुखे आव्या तात पनोता नंद,
म्हारे आंगण वुठ्या अमृत दुधे महुला,
म्हारे आंगण फळीया सुर तरु सुखना कंद,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....17
ऐणी परे गायु माता त्रिशला सूतनु हालरू,
जे कोई गाशे लेशे पुत्र तणा साम्राजय,
बिलिमोरा नगरे वर्णव्यू श्री वीरनु हालरु,
जय जय मंगल होजो दीप विजय कविराज,
हालो हालो हालो हालो म्हारा नंदने रे.....18