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शुक्रवार, 17 मई 2019

धार्मिक प्रश्नोत्तरी

1. गुण और पर्यायों का जो आधार है, वह क्या है ?

उत्तर- द्रव्य ( गुण पर्यायाश्रयो द्रव्यं) 

2. वस्तु के निरंतर साथ रहने वाले धर्म को क्या कहते हैं ?

उत्तर- गुण ( सहभावी धर्मोंगुणः)  

3. गुण के दो प्रकार कौन-से हैं ?

उत्तर- सामान्य गुण और विशेष गुण। 

4. वस्तु के विसदृश को कौन-सा सा गुण कहते हैं ?

उत्तर- विशेष गुण। 

5. वस्तु के सदृश पर्याय को कौन-सा गुण कहते हैं ?

उत्तर- सामान्य गुण। 

6. वस्तु की परिवर्तनशील अवस्था को क्या कहते हैं ?

उत्तर- पर्याय। 

7. द्रव्य के कितने भेद हैं ?

उत्तर- 6 भेद। 

धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, कालद्रव्य, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय ।

8. वस्तु के स्वभाव को क्या कहते हैं  ?

उत्तर- धर्म। 

9. प्रदेशों के समूह को क्या कहते हैं ?

उत्तर- अस्तिकाय। 

अस्ति का अर्थ है - 'प्रदेश' । काय का अर्थ है - 'समूह' ।

10. जो प्रदेशों का समूह भूतकाल में था वर्तमान काल में है और भविष्यत् काल में रहेगा इस कारण से अस्तिकाय को क्या कहा जाता है ?

उत्तर- अस्तिकाय। 

11. अस्तिकाय कितने हैं ?

उत्तर- 5

धर्म, अधर्म, आकाश, जीव, पुद्गल ।

12. सब तत्त्वों में पहले कौन-सा अस्तिकाय कहा गया है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय। 

'धर्मास्तिकाय' के प्रारंभ में धर्म शब्द आया है 'धर्म' शब्द मंगल सूचक है, इसलिए सब तत्त्वों में पहले धर्मास्तिकाय कहा गया है ।

13. धर्मास्तिकाय के पश्चात् अधर्मास्तिकाय क्यों कहा गया है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय का विपरीत अधर्मास्तिकाय है । इसलिये धर्मास्तिकाय के बाद अधर्मास्तिकाय कहा गया है ।

14. धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय के बाद आकाशास्तिकाय क्यों कहा गया है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय, इन दोनों के लिए आकाशास्तिकाय आधार रूप है, इसलिए इन दोनों के बाद आकाशास्तिकाय कहा गया है ।

15. आकाशास्तिकाय के बाद जीवास्तिकाय क्यों कहा गया है ?

उत्तर- आकाश, अनंत और अमूर्त्त है तथा जीव भी अनंत और अमूर्त्त है । इस प्रकार इन दोनों तत्त्वों की समानता होने से आकाशास्तिकाय के बाद चौथा तत्त्व जीवास्तिकाय कहा गया है ।

16. जीवास्तिकाय के बाद पुद्गलास्तिकाय क्यों कहा गया है ?

उत्तर- जीव तत्त्व के उपयोग में 'पुद्गल तत्त्व' आता है । इसलिये जीवास्तिकाय के बाद पुद्गलास्तिकाय कहा गया है ।

17. धर्मास्तिकाय के कितने भेद हैं ?

उत्तर- तीन भेद हैं ।

स्कंध, देश, प्रदेश ।

18. धर्मास्तिकाय की पहचान कितने प्रकार से होती है ?

उत्तर- पाँच प्रकार से ।

19. धर्मास्तिकाय की पहचान कराने वाले पाँच बोल कौन-से हैं ?

उत्तर- द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और गुण । 

20. द्रव्य से धर्मास्तिकाय कितना है ?

उत्तर- द्रव्य से धर्मास्तिकाय एक अखण्ड द्रव्य है ।

21. धर्मास्तिकाय कितने क्षेत्र में विस्तृत है ?

उत्तर- संपूर्ण लोक में। 

22. धर्मास्तिकाय का प्रभाव कब तक रहेगा ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय का प्रभाव अनादिकाल से है और अनंतकाल तक रहेगा ।

23. धर्मास्तिकाय कौन-सी इकाई है ?

उत्तर- अखंड अविभाज्य इकाई है ।

24. धर्मास्तिकाय में पाँच वर्ण में से कितने वर्ण पाये जाते हैं ?

उत्तर- एक भी नहीं ।

25. धर्मास्तिकाय में दो गंध में से कितनी गंध पायी जाती है ?

उत्तर- एक भी नहीं ।

26. धर्मास्तिकाय रूपी है या अरूपी है ?

उत्तर- अरूपी है ।

27. धर्मास्तिकाय जीव है या अजीव है ?

उत्तर- अजीव है ।

28. धर्मास्तिकाय शाश्वत है या अशाश्वत है ?

उत्तर- शाश्वत है ।

29. धर्मास्तिकाय लोकव्यापी है या अलोकव्यापी है ?

उत्तर- लोकव्यापी है ।

30. धर्मास्तिकाय के कितने प्रदेश है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय असंख्यात प्रदेशी है ।

31. धर्मास्तिकाय का गुण क्या  है ?

उत्तर- चलन गुण। 

पानी में मछली का दृष्टांत । जैसे - पानी के आधार से मछली चलती है, वैसे ही जीव और पुद्गल धर्मास्तिकाय के आधार से गति करते हैं ।

32. धर्मास्तिकाय द्रव्य को अनन्य सहायक क्यों कहा गया है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य के बिना जीव और पुद्गल गति नहीं कर सकते, इसलिए वह अनन्य सहायक कहा गया है ।

33. नयनों की पलक गिरने में कौन-सा द्रव्य सहायक होता है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य। 

34. मन के चंचल होने में कौन-सा द्रव्य सहायक होता है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य

35. चलने में कौन-सा द्रव्य सहायक होता है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य। 

36. कबूतर किस द्रव्य के आधार से आकाश में उड़ता है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य के आधार से

37. बिल्ली किस द्रव्य के आधार पर फुदकती है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य के आधार से ।

38. प्लेन किस आधार से आकाश में गति करता है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य के आधार से ।

39. सूर्य चंद्र के विमान किस द्रव्य के आधार से सुमेरु पर्वत के चक्कर लगाते है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य के आधार से ।

40. मनुष्य किस द्रव्य की सहायता से नदी में तैरता है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य की सहायता से ।

41.  देवता किस द्रव्य की सहायता से मनुष्य लोक में आते हैं ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय द्रव्य की सहायता से ।

42. बस, कार जीप किस द्रव्य की सहायता से चलते हैं ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय के आधार से ।

43. मोबाइल की आवाज किस द्रव्य की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचती है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय के आधार से ।

44. कोई महाऋद्धिवंत देव लोकान्त पर स्थिर होकर अलोक में अपने हाथ-पैर फैला सकता है?

उत्तर- नहीं फैला सकते ।

45. महिऋद्धिवंत देव अलोक में हाथ-पैर क्यों नहीं फैला सकता है ?

उत्तर- क्योंकि धर्मास्तिकाय वहाँ नहीं है ।

46. चमरेन्द्र प्रथम देवलोक में किस द्रव्य की सहायता से गये ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय की सहायता से ।

47. गति के लिए निमित्त कारण क्या है ?

उत्तर - जिस प्रकार मछली की गति के लिए जल निमित्त कारण है, उसी तरह जीव और पुद्गलों की गति में जो आपेक्षित कारण है, निमित्त कारण है, वह धर्मास्तिकाय है ।

48. क्या केवली भगवान के केवली समुद्घात करते समय उनके आत्म प्रदेश लोक से बाहर जा सकते हैं ?

उत्तर- नहीं, क्योंकि लोक के बाहर धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय नहीं है ।

49. घड़ी किस द्रव्य की सहायता से टाईम दिखाती है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय की सहायता से ।

50. मंदिर की ध्वजा किस द्रव्य की सहायता से लहराती है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय की सहायता से ।

51. गति, शक्ति धर्मास्तिकाय में विद्यमान है या जीव और पुद्गल में?

उत्तर- गति, शक्ति जीव और पुद्गल में हैं, धर्मास्तिकाय में नहीं ।

52. मनुष्य स्त्री किस द्रव्य की सहायता से चलती है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय की सहायता से ।

53. स्त्रियाँ किस द्रव्य की सहायता से नृत्य गान करती है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय की सहायता से ।

54. गति परिणत जीवों और पुद्गलों को गति करने में कौन-सा द्रव्य सहायक होता है व कैसे होता है ?

उत्तर- स्वभावतः गति परिणत जीवों और पुद्गलों को गति करने में सहायता करने वाला द्रव्य धर्मास्तिकाय है । जिस प्रकार मछली को तैरने में जल सहायक है, अथवा वृद्ध पुरुष को चलने में दण्ड सहायक होता है । इसी तरह जीवों और पुद्गलों की गति क्रिया में निमित्त होने वाला द्रव्य धर्मास्तिकाय में नहीं ।

55. दूसरा द्रव्य कौन-सा है ?

उत्तर- अधर्मास्तिकाय। 

56. अधर्मास्तिकाय किसे कहते हैं ?

उत्तर- जीव और पुद्गलों की स्थिति में सहायक होने तत्त्व अधर्मास्तिकाय कहलाता है ।

57. अधर्मास्तिकाय स्थिति में सहायक कैसे होता है ?

उत्तर- जैसे वृक्ष की छाया पथिक के लिये ठहरने में निमित्त कारण होती है, इसी तरह अधर्मास्तिकाय जीव और पुद्गलों की स्थिति में सहायक होता है । अधर्मास्तिकाय स्थिति में प्रेरक नहीं है, अपितु उपकारक सहायक मात्र है ।

58. अधर्मास्तिकाय कौन-सी इकाई है ?

उत्तर- धर्मास्तिकाय की तरह यह एक अखंड अविभाज्य इकाई है ।

59. अधर्मास्तिकाय के कितने भेद हैं ?

उत्तर- 3

स्कंध, देश, प्रदेश।

60- स्कंध किसे कहते हैं ?

उत्तर- अनेक देश का समूह स्कंध कहलाता है ।

61- देश किसे कहते हैं ?

उत्तर- अनेक प्रदेश मिलकर देश कहलाते हैं ।

62- प्रदेश किसे कहते हैं ?

उत्तर- वह सूक्ष्म भाग प्रदेश कहलाता है जिसके दूसरे भाग की कल्पना भी ना की जा सके और जो स्कंध द्रव्य के साथ अवयव रूप से मिला हुआ हो ।

63- अधर्मास्तिकाय की पहचान कितने बोलों से होती है ?

उत्तर- पाँच बोलों से ।

 द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, गुण ।

64- द्रव्य से अधर्मास्तिकाय कितना हैं ?

उत्तर- एक अखंड द्रव्य है ।

65- क्षेत्र से अधर्मास्तिकाय कितने क्षेत्र में विस्तृत है ?

उत्तर- संपूर्ण लोक में विस्तृत है ।

66- काल से अधर्मास्तिकाय कब से है और कब तक रहेगा ?

उत्तर- अनादि काल पूर्व से है और अनंत काल तक रहेगा ।

67- अधर्मास्तिकाय में 5 वर्ण में से कितने वर्ण पाये जाते हैं ?

उत्तर- एक भी नहीं ।

68- अधर्मास्तिकाय में 2 गंध में से कितने गंध पाये जाते हैं ?

उत्तर- एक भी नहीं ।

69- अधर्मास्तिकाय में 5 रस में से कितने रस पाये जाते हैं ?

उत्तर- एक भी नहीं ।

70- अधर्मास्तिकाय में 8 स्पर्श में से कितने स्पर्श पाये जाते हैं ?

उत्तर- एक भी नहीं ।

71- अधर्मास्तिकाय रूपी है या अरूपी है ?

उत्तर- अरूपी है ।

72- अधर्मास्तिकाय जीव है या अजीव है ?

उत्तर- अजीव है ।

73- अधर्मास्तिकाय शाश्वत है या अशाश्वत है ?

उत्तर- शाश्वत है ।

74- अधर्मास्तिकाय के कितने प्रदेश है ?

उत्तर- असंख्यात प्रदेशी ।

75- अधर्मास्तिकाय का गुण क्या है ?

उत्तर- अधर्मास्तिकाय स्थिति गुण वाला है अर्थात् स्थिति परिणाम वाले जीव और पुद्गलों की स्थिति में सहायक होता है । जैसे - विश्राम चाहने वाले थके हुये पथिक के ठहरने में छायादार वृक्ष सहायक होता है ।

76- सिद्ध  भगवान किस द्रव्य के आधार से लोकाग्र पर ठहरते है ?

उत्तर- अधर्मास्तिकाय के आधार से। 

77- देव विमान अलोक में ठहर सकते हैं ?

उत्तर- नहीं ठहर सकते ।

78- देव विमान अलोक में क्यों नहीं ठहर सकते ?

उत्तर- क्योंकि वहाँ अधर्मास्तिकाय नहीं है ।

79- वृक्ष की छाँव में बैठकर प्राणी किस द्रव्य के आधार पर विश्राम करता है ?

उत्तर- अधर्मास्तिकाय के आधार से ।

80- थके हुये प्राणी को विश्राम कौन-सा द्रव्य कराता है ?

उत्तर- अधर्मास्तिकाय। 

81- रूकने में कौन-सा द्रव्य सहायक है ?

उत्तर- अधर्मास्तिकाय.

82- वर्तमान में वैज्ञानिकों द्वारा मान्य गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या जैन दर्शन में किससे मिलती है ?

उत्तर- अधर्म द्रव्य से ।

83- आइन्सटीन ने गुरुत्वाकर्षण का स्वरूप क्या बताया ?

उत्तर- निष्क्रिय, अदृश्य और आकार रहित है । पदार्थों के स्थिर होने में सहायक या उपकारी कारण अथवा माध्यम बताया है ।

84- आकाश किसे कहते हैं ?

उत्तर- जीव और पुद्गलों को अवगाह देने वाले द्रव्य को आकाश कहते हैं ।

85- आकाशास्तिकाय किसे कहते हैं ?

उत्तर- सबको आश्रय देने वाले द्रव्य को आकाशास्तिकाय कहते हैं ।

86- आकाशास्तिकाय के दो कौन-से हैं ?

उत्तर- लोकाकाश और अलोकाकाश ।

87- जहाँ आकाश ही आकाश है और द्रव्य नहीं है, वह क्या कहलाता है ?

उत्तर- अलोकाकाश।

88- जिस आकाश खंड में धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल और जीव पंचास्तिकाय विद्यमान है, वह क्या कहलाता है ?

उत्तर- लोकाकाश।

89- कौन-सा द्रव्य संपूर्ण लोकाकाश में स्थित है ?

उत्तर- धर्म और अधर्म - ये दोनों अस्तिकाय ऐसे अखण्ड स्कंध हैं, जो संपूर्ण लोकाकाश में स्थित है ।

90- लोक अलोक भागों की कल्पना कौन से द्रव्यों के संबंध के कारण है ?

उत्तर- वस्तुतः अखंड आकाश के लोक अलोक भागों की कल्पना भी धर्म-अधर्म द्रव्यों के संबंध के कारण ही है । जहाँ धर्म-अधर्म द्रव्यों का संबंध न हो वह अलोक और जहाँ इनका संबंध हो वह लोक है ।

धार्मिक प्रश्नोत्तरी

1. ज्ञान कितने प्रकार का है ?

उत्तर- पाँच 

मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान, केवलज्ञान 


2. श्रुतज्ञान का सहयोगी ज्ञान कौन-सा है ?

उत्तर- मतिज्ञान 


3. इन्द्रियों और मन की सहायता से कौन-सा ज्ञान होता है ?

उत्तर- श्रुतज्ञान 


4. श्रुतज्ञान के कितने भेद हैं ?

उत्तर- 14 (चौदह)

1. अक्षर श्रुत, 2. अनक्षर श्रुत, 3. संज्ञी श्रुत, 4. असंज्ञी श्रुत, 5. सम्यक् श्रुक, 6. मिथ्या श्रुत, 7. सादी श्रुत, 8. अनादि श्रुत, 9. सपर्यवसित श्रुत, 10. अपर्यवसित श्रुत, 11. गमिक श्रुत, 12. अगमिक श्रुत, 13. अंग प्रविष्ट श्रुत, 14. अनंग प्रविष्ट श्रुत


5. अंग प्रविष्ट श्रुतज्ञान के कितने प्रकार हैं  ?

उत्तर- 12 (बारह)

1. आचारांग, 2. सूत्रकृतांग, 3. स्थानांग, 4. समवायांग, 5. भगवती (विवाह पन्नति = व्याख्या -प्रज्ञप्ति), 6. ज्ञाताधर्म कथांग, 7. उपासक दशांग, 8. अन्तकृत् दशांग, 9. अनुत्तरौपपातिक दशांग, 10. प्रश्नव्याकरण सूत्र, 11. विपाक सूत्र, 12. दृष्टिवाद


6. अंग प्रविष्ट श्रुतज्ञान के बारह भेदों को किस नाम से जाना जाता है ?

उत्तर- द्वादशांगी गणिपिटक


7. इन्द्रियों एवं बुद्धि के द्वारा पदार्थों का बोध करना, कौन सा ज्ञान है ?

उत्तर- मतिज्ञान 


8. कौन से ज्ञान के द्वारा बुद्धि को यथार्थ रूप से सोचने-समझने की प्रेरणा मिलती है ?

उत्तर- श्रुतज्ञान 


9. श्रुतज्ञान की आराधना करने से कौन से कर्म का क्षय होता है ?

उत्तर- ज्ञानावरणीय कर्म 


10. बारह अंग सूत्रों में से प्रथम अंग सूत्र कौन सा है ?

उत्तर- आचारांग सूत्र 


11. अंग सूत्रों का सार क्या है ?

उत्तर- आचार


12. आचार का सार क्या है ?

उत्तर- अनुयोग-अर्थ 


13. अनुयोग का सार क्या है ?

उत्तर- प्ररूपणा करना


14. प्ररूपणा का सार क्या है ?

उत्तर- सम्यक्चारित्र को स्वीकार करना ।


15. सम्यक्चारित्र का सार क्या है ?

उत्तर- निर्वाण पद की प्राप्ति 


16. निर्वाण पद पाने का सार क्या है ?

उत्तर- अक्षय सुख को प्राप्त करना ।


17. संपूर्ण जैन आगम कितने अनुयोगों में विभाजित किये जाते हैं ?

उत्तर- चार अनुयोगों में 

1. धर्म कथानुयोग, 2. गणितानुयोग, 3. द्रव्यानुयोग, 4. चरणकरणानुयोग 


18. आचारांग सूत्र कौन से अनुयोग के अंतर्गत है ?

उत्तर- चरणकरणानुयोग 


19. संक्षिप्त सूत्र का विस्तृत विवेचन करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- अनुयोग 


20. आचारांग सूत्र में कितने आचारों का वर्णन है ?

उत्तर- पाँच 

1. ज्ञानाचार, 2. दर्शनाचार, 3. चारित्राचार, 4. तपाचार, 5. वीर्याचार


21. ज्ञानाचार के कितने प्रकार है ?

उत्तर- आठ

1. काल, 2. विनय, 3. बहुमान, 4. उपधान, 5. अणिण्हवण-अनिह्नवता, 6. व्यंजन, 7. अर्थ, 8. तदुभय


22. सूत्र और अर्थ को बहुमान एवं आदर पूर्वक ग्रहण करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- तदुभय


23. नियत समय पर शास्त्र का स्वाध्याय करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- काल


24. जिससे आगम का ज्ञान प्राप्त किया हो, उसके नाम को गुप्त ना  रखना क्या कहलाता है ?

उत्तर- अणिण्हवण-अनिह्नवता 


25. सूत्र के शुद्ध एवं यथार्थ अर्थ को ग्रहण करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- अर्थ 


26. विनय भक्ति पूर्वक शास्त्र का अनुशीलन करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- विनय


27. तप करते हुए शास्त्र का अध्ययन करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- उपधान


28. सूत्र का शुद्ध उच्चारण करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- व्यंजन 


29. बहुमान पूर्वक शास्त्र का अध्ययन करना क्या कहलाता है ?

उत्तर- बहुमान 


30. दर्शनाचार कितने प्रकार का है ?

उत्तर- आठ

1. निःशंकित, 2. निःकांक्षित, 3. निर्विचिकित्सा, 4. अमूढ़ दृष्टि,  5. उपबृहण, 6. स्थिरीकरण, 7. वात्सल्य, 8. प्रभावना

31. धर्म की विविध प्रकार से प्रभावना करना कौन सा दर्शनाचार है ?

उत्तर- प्रभावना दर्शनाचार ।


32. अन्यमत की प्रशंसा नहीं करना कौन सा दर्शनाचार है ?

उत्तर- निःकांक्षित दर्शनाचार ।


33. समान धर्म एवं समाचारी वालों के प्रति दया एवं प्रेम का भाव रखना कौन सा दर्शनाचार है  ?

उत्तर- वात्सल्य दर्शनाचार ।


34. स्वकृत कर्म के फल में संदेह नहीं करना कौन सा दर्शनाचार है ?

उत्तर- निर्विचिकित्सा ।


35. धर्म में डीगते हुए व्यक्ति को धर्म में अडिग रखना कौन सा दर्शनाचार है ?

उत्तर- स्थिरीकरण ।


36. जिनवाणी में संशय नहीं करना कौन सा दर्शनाचार है ?

उत्तर- निःशंकित ।


37. किसी व्यक्ति के प्रति मूढ़ दृष्टि नहीं होना, यह दर्शनाचार का कौन-सा प्रकार है ?

उत्तर- अमूढ़ दृष्टि ।


38. गुणियों के गुण की प्रशंसा करना, यह दर्शनाचार का कौन-सा प्रकार है ?

उत्तर- उपबृहण ।


39. चारित्राचार के कितने प्रकार है ?

उत्तर- आठ।

 पाँच समिति

 (1. ईर्या समिति, 2. भाषा समिति, 3. एषणा समिति, 4. आदान भाण्डमात्र निक्षेपणा समिति, 5. उच्चार प्रस्रवण खेल जल्ल परिष्ठापनिका समिति)

 तीन गुप्ति

( 1. मन गुप्ति, 2. वचन गुप्ति, 3. काया गुप्ति)


40. चारित्राचार के आठ प्रकारों को क्या कहते हैं ?

उत्तर- अष्ट प्रवचन माता ।


41. तपाचार के कितने भेद और प्रकार है ?

उत्तर- 2 भेद और 12 प्रकार ।

1. बाह्य तप और 2.आभ्यंतर तप


बाह्य तप

अनशन, उनोदरी, भिक्षाचर्या, रसपरित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता तप ।

आभ्यंतर तप

 प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान, कायोत्सर्ग ।


42. अपनी आत्मशक्ति या आत्मसामर्थ्य के द्वारा कर्म श्रंखला को क्षीण या क्षय करना क्या है ?

उत्तर- वीर्याचार ।


43. आचारांग सूत्र में कितने श्रुतस्कंध है ?

उत्तर- दो ।


44. आचारांग सूत्र में कुल मिलाकर कितने अध्ययन है ?

उत्तर- 25 अध्ययन ।


45. आचारांग सूत्र में चूलिका सहित कितने पद है ?

उत्तर- 18,000 पद ।


46. आचारांग सूत्र में कितने उद्देशक और समुद्देशनकाल हैं ?

उत्तर- 85 उद्देशक और 85 समुद्देशनकाल ।


47. आचारांग सूत्र के प्रथम श्रुतस्कंध का स्थानांग सूत्र में किस नाम से वर्णन मिलता है ?

उत्तर- ब्रह्मचर्य नाम से ।


48. आचारांग सूत्र में प्रथम श्रुतस्कंध (ब्रह्मचर्य) के कितने अध्ययन कहे गये हैं ?

उत्तर- नौ अध्ययन ।

1. शस्त्र परिज्ञा, 2. लोक विजय, 3. शीतोष्णीय, 4. सम्यक्त्व, 5. लोकसार, 6. धूत, 7. विमोह (विमोक्ष), 8. उपधान, 9. महापरिज्ञा ।


49. आचारांग सूत्र में द्वितीय श्रुतस्कंध के कितने अध्ययन कहे गये हैं ?

उत्तर- 16 अध्ययन ।

1. पिण्डैषणा, 2. शय्यैषणा, 3. इर्यैषणा, 4. भाषैषणा, 5. वस्त्रैषणा, 6. पात्रैषणा, 7. अवग्रह प्रतिमा, 8. सप्तसप्तिका, 9. निषीधिका, 10. उच्चार प्रसवण, 11. शब्दसप्तकका, 12. रूपसप्तैकका, 13. परक्रिया, 14. अन्योन्य क्रिया, 15. भावना, 16. विमुक्ति ।


50. आचारांग सूत्र कौन-सी भाषा में है ?

उत्तर- अर्धमागधी भाषा ।

तीर्थंकर भगवान अर्धमागधी भाषा में उपदेश/देशना देते हैं इस कारण से आचारांग सूत्र की भाषा भी अर्धमागधी है ।


51. तीर्थंकर भगवान के अलावा और कौन-कौन अर्धमागधी भाषा में बोलते हैं और इसका उल्लेख कहाँ मिलता है ?

उत्तर- देवगति के देव-देवांगनाएं और आर्य पुरुष ।

इसका उल्लेख भगवती एवं प्रज्ञापना आदि सूत्रों में मिलता है ।


52. ब्राह्मी लिपि में कितने प्रकार का लेख विधान (लेखन-प्रकार) बताया गया है ?

उत्तर- 18 प्रकार का ।


1. ब्राह्मी, 2. यवनानी, 3. दोषापुरिका, 4. खरोष्ट्री, 5. पुष्करशारिका  6. भोगवतिका, 7. प्रहरादिका, 8. अन्ताक्षरिका, 9. अक्षर पुष्टिका, 10. वैनयिका, 11. निह्नविका, 12. अंकलिपि, 13. गणितलिपि, 14. गंधर्वलिपि, 15. आदर्श लिपि, 16. माहेश्वरी, 17. तामिली-द्राविड़ी, 18. पौलिन्दी ।


53. सूत्र किसे कहते हैं ?

उत्तर- अक्षर से अल्प, हो और अर्थ से महान एवं विराट हो, 32 दोषों से रहित और 8 गुणों से युक्त हो, वह सूत्र है ।


54. सूत्र के आठ गुणों और बत्तीस दोषों का वर्णन किस आगम में है ?

उत्तर - अनुयोग द्वार सूत्र में ।

 

 सूत्र के आठ गुण 


1. निर्दोष, 2. सारवत्, 3. हेतुयुक्त, 4. अलंकृत, 5. उपनीत, 6. सोपचार, 7. मित, 8. मधुर ।


 सूत्र के 32 दोष 


1. अनृत दोष, 2. उपघात दोष, 3. निरर्थक दोष, 4. अपार्थक दोष, 5. छल दोष, 6. द्रुहिल दोष, 7. निस्सार दोष, 8. अधिक दोष, 9. ऊन दोष, 10. पुनरूक्त दोष, 11. व्याहत दोष, 12. अयुक्त दोष, 13. क्रमभिन्न दोष, 14. वचनभिन्न दोष, 15. विभक्ति भिन्न दोष, 16. लिंग भिन्न दोष, 17. अनभिहित दोष, 18. अपद दोष, 19. स्वभाव हीन दोष, 20. व्यवहित दोष, 21. काल दोष, 22. यति दोष, 23. छवि दोष, 24. समयविरूद्ध दोष, 25. निर्हेतुक दोष, 26. अर्थापत्ति दोष, 27. असमास दोष, 28. उपमा दोष, 29. रूपक दोष, 30. निर्देश दोष, 31. पदार्थ दोष, 32. संधि दोष ।


55. वर्ण आदि के नियत परिणाम से युक्त हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- मित गुण ।


56. समस्त अनृत, उपघात आदि दोषों से रहित हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- निर्दोष ।


57. जो अनेक पर्यायों से युक्त हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- सारवत् ।


58. असभ्य कहावतों से नहीं, किन्तु सभ्य और शिष्ट कहावतों से युक्त हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- सोपचार।


59. जो सुनने में मधुर हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- मधुर।


60. अन्वय, व्यतिरेक आदि हेतुओं से संयुक्त हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- हेतुयुक्त ।


61. उपनय आदि के द्वारा जिसका उपसंहार किया गया हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- उपनीत


62. उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारो से विभूषित हो, यह सूत्र का कौन-सा गुण है ?

उत्तर- अलंकृत


63. सत्य का अपलाप करना व असत्य की स्थापना करना सूत्र का कौन-दोष है ?

उत्तर- अनृत दोष 

( जैसे - अनादिकाल से चले आ रहे जगत् को ईश्वर कर्तृक बतलाना असत्य की स्थापना है और आत्मा-परलोक आदि के अस्तित्व का निषेध करना सत्य का अपलाप करना है ।)


64. हिंसा का विधान करना सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- उपघात दोष ।

(जैसे - वेद विहित हिंसा, हिंसा नहीं है ।)


65. जिस सूत्र में केवल वर्णों का निर्देश हो, किन्तु उसका कोई अर्थ न निकलता हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- निरर्थक दोष ।

(जैसे - अ, आ, इ, ई या डित्थ-डवित्थ आदि।)


66. जो सूत्र असंबद्धार्थक हो या अर्थ के संबंध से शून्य हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- अपार्थक दोष ।

(जैसे - दशदाडिमानि, षड्पूपा आदि ।)


67. जहाँ विवक्षित अर्थ का अनिष्ट अर्थान्तर के द्वारा उपघात किया जाये, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- छल दोष ।

(जैसे - किसी ने कहा - देवदत्त के पास नव (नया) कंबल है । परंतु कोई व्यक्ति यह कहकर उसका विरोध करे कि देवदत्त के पास नव (9) कंबल कहाँ है ? वह नवीन (नया) अर्थ में प्रयुक्त नव शब्द को संख्यावाची बनाकर विरोध करे तो यह छल है ।)


68. जो सूत्र साधक को अहित कर उपदेश दे और पापकार्य का परिपोषक हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- द्रुहिल दोष ।


69. जिस सूत्र में कोई युक्ति या तर्क न होकर केवल शब्दाडंबर हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- निस्सार दोष ।


70. जिस सूत्र में पद या अक्षर अधिक हों, या एक हेतु या उदाहरण से अर्थ सिद्धि  होने पर भी कई हेतु या उदाहरण दिये हों, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- अधिक दोष ।


71. जिसमें अक्षर, मात्रा, पद, आदि कम हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- ऊन दोष ।

(जैसे - कृतक होने से शब्द अनित्य है, यहाँ उदाहरण की कमी है ।)


72. एक ही बात को पुनः पुनः दोहराना, यह सूत्र का कौन सा दोष है ?

उत्तर- पुनरूक्त दोष ।


73. जिस सूत्र में पूर्व कथन का पर वाक्य से खंडन होता है, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- व्याहत दोष ।


74. जो वाक्य उपपत्ति से युक्त न हो, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- अयुक्त दोष ।


75. जिसमें पदार्थ को क्रमशः न रखा जाए, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- क्रमभिन्न दोष ।

(जैसे - श्रोत, चक्षु, घ्राण, रसना, स्पर्श इन्द्रिय न कहकर घ्राण, चक्षु, श्रोत, स्पर्श, रसनेन्द्रिय कहना ।)


76. जिस सूत्र में विशेष्य और विशेषण भिन्न हो, सूत्र का कौन-सा दोष है  ?

उत्तर- वचनसिद्ध दोष


77. जिस सूत्र में विशेष्य और विशेषण में विभक्ति भिन्न हो, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- विभक्ति विभिन्न दोष


78. जिस सूत्र में विशेष्य और विशेषण में लिंग भिन्न हो, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- लिंग भिन्न दोष


79. अपनी सैद्धांतिक मान्यता के विरुद्ध पदार्थों का वर्णन करना, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- अनभिहित दोष


80. पद्य छंद के संबंध अनुचित योजना करना, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- अपद दोष


81. जिस सूत्र में वस्तु का स्वभाव  से विपरीत चित्रण किया जाये, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- स्वभाव हीन दोष


82. प्रासंगिक विषय को छोड़कर अप्रासंगिक विषय का वर्णन करना और पुनः प्रासंगिक विषय पर आ जाना, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- व्यवहित दोष


83. जिस सूत्र में भूत, भविष्य, वर्तमान का ध्यान न हो, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- काल दोष


84. पद्य या गद्य रचना में पूर्ण विराम, अर्ध विराम आदि का ध्यान न रखा हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- यति दोष 


85. जहाँ पर कोई विशेष अलंकार उपयुक्त हो, फिर भी उसे वहाँ नहीं कहना, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- छवि दोष 


86. किसी के मान्य सिद्धांत के विरूद्ध मत की स्थापना करना, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- समयविरूद्ध दोष 

(जैसे- वेदान्त को द्वैतवादी और जैन दर्शन को अद्वैतवादी कहना ।)


87. जिस सूत्र में युक्ति हेतु आदि कुछ न हो, केवल शब्द मात्र हो, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- निर्हेतुक दोष


88. जिस वाक्य का अर्थोपत्ति से अनिष्ट अर्थ निकलता हो, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- अर्थापत्ति दोष


89. जिस जगह समास होता है, वहाँ समास नहीं करना या विपरीत समास करना, सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- असमास दोष


90. हीन या अधिक उपमा बताना, यह सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- उपमा दोष


91. पदार्थों के स्वरूप एवं अवयवों का विपरीत रूपक के द्वारा वर्णन करना सूत्र का कौन-सा दोष है ?

 उत्तर- रूपक दोष


92. निर्दिष्ट पदों में एकरूपता नहीं रखना सूत्र का कौन-सा दोष है ?

उत्तर- निर्देश दोष


93. आचारांग सूत्र के प्रथम अध्ययन का नाम क्या है ?

उत्तर- शस्त्र परिज्ञा 


94. आचारांग सूत्र प्रथम अध्ययन में कितने उद्देशक हैं ?

 उत्तर- 7 उद्देशक 


95. शास्त्र के अनेकों विभागों को क्या कहते हैं  ?

 उत्तर - अध्ययन


96. एक अध्ययन में प्रयुक्त होने वाले अभिनव विषय को नये शीर्षक से प्रारंभ करने की पद्धति को आगमिक भाषा में क्या कहते हैं ?

 उत्तर- उद्देशक 


97. आचारांग सूत्र के प्रथम अध्ययन में शस्त्र को किसका कारण बताया गया है ?

 उत्तर- महाभय का


98. शस्त्र से वैर बढ़ता है और वैर विरोध के बढ़ने से क्या बढता है ? उत्तर- संसार परिभ्रमण 


99. आचारांग सूत्र के पहले उद्देशक में किसका सामान्य संबोधन करके वर्णन किया गया है ?

 उत्तर- जीव का


100. आचारांग सूत्र के दूसरे उद्देशक में किससे निवृत्ति का उपदेश दिया गया है ?

उत्तर- पृथ्वीकाय की हिंसा से निवृत्ति का उपदेश ।


101. आचारांग सूत्र के तीसरे उद्देशक में किससे निवृत्ति का उपदेश दिया गया है ?

 उत्तर- अपकाय की हिंसा से निवृत्ति का उपदेश ।


102. आचारांग के चौथे उद्देशक में किससे निवृत्ति का उपदेश दिया गया है ?

 उत्तर- तेउकाय की हिंसा से निवृत्ति का उपदेश ।


103. आचारांग के पाँचवें उद्देशक में किससे निवृत्ति का उपदेश दिया गया है ?

 उत्तर- वायुकाय की हिंसा से निवृत्ति का उपदेश ।


104. आचारांग सूत्र के छठें उद्देशक में किससे निवृत्ति का उपदेश दिया गया है ?

उत्तर- वनस्पतिकाय की हिंसा से निवृत्ति का उपदेश ।


105. आचारांग सूत्र के सातवें उद्देशक  में किससे निवृत्ति का उपदेश दिया गया है ?

 उत्तर- त्रसकाय की हिंसा से निवृत्ति का उपदेश 


106. चेतना को क्या कहते हैं ?

उत्तर- संज्ञा 


107. चेतना के कितने भेद हैं ?

 उत्तर- दो - ज्ञान चेतना और अनुभव चेतना


108. विशेष बोध को क्या कहते हैं ?

उत्तर- ज्ञान चेतना 


109. ज्ञान चेतना के कितने भेद हैं ?

उत्तर- पाँच ।

मतिज्ञान चेतना, श्रुतज्ञान चेतना, अवधिज्ञान चेतना, मनःपर्यवज्ञान चेतना और केवलज्ञान चेतना ।


110. संवेदन को कौन-सी चेतना कहते हैं ?

उत्तर- अनुभव चेतना (संज्ञा)


111. अनुभव चेतना (संज्ञा) के कितने भेद हैं ?

 उत्तर- सोलह ।


आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा, क्रोध संज्ञा, मान संज्ञा, माया संज्ञा, लोभ संज्ञा, ओघ संज्ञा, लोक संज्ञा, सुख संज्ञा, दुःख संज्ञा, मोह संज्ञा, विचिकित्सा संज्ञा, शोक संज्ञा और धर्म संज्ञा ।


112. क्षुधा वेदनीय कर्म के उदय से उत्पन्न होने वाली आहार की अभिलाषा रूप आत्मा की परिणति कौन-सी संज्ञा है ?

 उत्तर- आहार संज्ञा 


113. आहार संज्ञा किन जीवों के होती हैं ?

उत्तर- एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीवों में होती है ।


114. आहार संज्ञा कितने कारणों से उत्पन्न होती है ?

 उत्तर- चार कारणों से ।


 1. क्षुधा वेदनीय के उदय से ।

2. पेट खाली होने से ।

3. आहार की कथा करने से ।

4. आहार का चिन्तन करने से, भोज्य वस्तु के श्रवण, दर्शन, चिन्तन से ।


115. किसी कारण से या बिना कारण के ही मोहनीय कर्म के उदय से भयभीत होने की आत्म परिणति क्या कहलाती है ।

उत्तर- भय संज्ञा 


116. भय संज्ञा की उत्पत्ति के कितने कारण हैं ?

 उत्तर- चार ।


1. दुर्बलता से अर्थात् अशक्तता के कारण ।

2. भय मोहनीय के उदय से ।

3. भय उत्पन्न करने वाली बात सुनने से ।

4. भयंकर वस्तु के देखने से अथवा इहलोक आदि में भयजनक वस्तु का विचार करने के कारण ।


117. भय संज्ञा जीवों में कब तक रहती है ?

 उत्तर- संसार के अंत तक केवलज्ञान प्राप्ति से कुछ समय पूर्व तक रहती है ।


118. वेद मोहनीय कर्म के उदय से विषयेच्छा को तृप्त करने की अभिलाषा होना कौन-सी संज्ञा सै ?

 उत्तर- मैथुन संज्ञा 


119. मैथुन संज्ञा क्यों उत्पन्न होती है ?

उत्तर  - शरीर में रक्त मांस की वृद्धि होने से, वेद मोहनीय कर्म के उदय से, स्त्रीकथा/पुरुषकथा आदि के श्रवण से उत्पन्न हुई बुद्धि से, मैथुन का विचार-चिन्तन करने से ।


120. लोभ मोहनीय/कषाय मोहनीय कर्म के उदय से धर्म के उपकरणों के सिवाय अन्य सचित्त, अचित्त, मिश्र पदार्थों को मूर्च्छा, आसक्ति, ममत्व भावों से ग्रहण करना कौन-सी संज्ञा है ?

 उत्तर- परिग्रह संज्ञा


121- परिग्रह संज्ञा क्यों उत्पन्न होती है ?

उत्तर- अति मूर्च्छा, आसक्ति होने से, लोभ मोहनीय कर्म के उदय से, परिग्रह की बात सुनने से, परिग्रह का चिन्तन करने से, सचित्त-अचित्त- मिश्र रूप वस्तुओं का परिग्रह देखने से, संग्रह करने से परिग्रह संज्ञा उत्पन्न होती है ।


122- परिग्रह संज्ञा एकेन्द्रियादि जीवों में कैसे पायी जाती है ?

उत्तर- परिग्रह संज्ञा एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीवों में पायी जाती है । वनस्पति कायिक में परिग्रह संज्ञा- बिल्व (बेल) आदि वनस्पतियाँ अपने पत्तों से फूल-फल वगैरह को ढंक लेती है, इससे उनमें परिग्रह संज्ञा का होना प्रतीत होता है ।


123- क्रोध मोहनीय कर्म के उदय से जीव में जातिमद आदि से उत्पन्न, कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक नष्ट कर देने पर की अप्रीतिरूप एवं जलन आत्मा की विभाव परिणति कौन-सी संज्ञा है ?

उत्तर- क्रोध संज्ञा 


124- कौन-सी संज्ञा से जीव अहंभाव, गर्व, घमंड का अनुभव करता है ?

उत्तर- मान संज्ञा 


125- कौन से कर्म के उदय से विचारों में एवं वाणी में उत्तेजना अथवा आवेश आता है ?

उत्तर- क्रोध मोहनीय कर्म के उदय से ।


126- मान संज्ञा क्या है ?

उत्तर- मान मोहनीय के उदय से अहंकार रूप आत्मा की विभाव परिणति मान संज्ञा है । मान संज्ञा से जीव, अहंभाव, गर्व, घमंड का अनुभव करता है ।


127- किस संज्ञा के कारण जीव छल-कपट-धूर्त-ठगाई-वंचकता आदि क्रियाएँ करता है ?

उत्तर- माया संज्ञा के कारण ।


128- माया संज्ञा क्या है ?

उत्तर- माया मोहनीय के उदय से जीव की कपटभाव रूप विभाव परिणति होना माया संज्ञा है माया संज्ञा के कारण जीव छल-कपट-धूर्त-ठगाई-वंचकता आदि क्रियाएँ करता है ।


129- लोभ संज्ञा क्या है ?

उत्तर- लोभ मोहनीय कर्म के उदय से सचित्त-अचित्त आदि वस्तुओं पर आसक्ति बंधन रूप विभाव परिणति लोभ संज्ञा है । भौतिक पदार्थों, विषय-वासनाओं एवं भोगोपयोग के साधनों को प्राप्त करने की लालसा बनाए रखना, संग्रह की कामना को बढ़ाते रहना लोभ संज्ञा का उदाहरण है ।


130- ओघ संज्ञा क्या है ?

उत्तर- ज्ञानावरणीय कर्म के अल्प क्षयोपशम से उत्पन्न होने वाली तथा अव्यक्त (अप्रकट) उपयोग रूप जीव का विभाव परिणमन ओघ संज्ञा है ।


131- लोक संज्ञा क्या है ?

उत्तर- ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से और मोहनीय कर्म के उदय से कुबुद्धि जनित तर्क रूप आत्मा की विभाव परिणति लोक संज्ञा है । जैसे - 'अपुत्रस्य गतिर्नास्ति' - पुत्र रहित को सद्गति नहीं मिलती, आदि लोक प्रचलित मान्यताओं पर विश्वास करना तथा उनके अनुसार अपनी धारणा बना लेना ।


132- सुख संज्ञा क्या है ?

उत्तर- संसारी जीवों को साता वेदनीय के उदय से सभी इन्द्रियों एवं मन के अनुकूल प्रतीत होने वाली विषयों के उपभोग एवं आनंद की अनुभूति सुख संज्ञा है ।


133- दुःख संज्ञा क्या है ?

उत्तर- संसारी जीवों को असाता वेदनीय के उदय से सभी इन्द्रियों के एवं मन के प्रतिकूल प्रतीत होने वाली, विविध प्रकार के संतापों का अनुभव रूप जीव की परिणति दुःख संज्ञा है ।


134- मोह संज्ञा के कारण जीव किसमें आसक्त रहता है ?

उत्तर- विषय-वासना एवं कषायों में ।


135- मोह संज्ञा क्या  है ?

उत्तर- मोहनीय कर्म के उदय से मिथ्या दर्शन रूप तथा ज्ञानादि गुणों का निषेध करने वाली, समस्त पापस्थानकों का कारण रूप आत्मा की विभाव परिणति मोह संज्ञा है । कुदेव, कुगुरु, कधर्म आदि में प्रवृत्ति होने से मोह संज्ञा का ज्ञान होता है । मोह संज्ञा के जीव विषय-वासना एवं कषायों में आसक्त रहता है ।

136- विचिकित्सा संज्ञा क्या है ?

उत्तर- मोहनीय एवं ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से सर्वज्ञ भगवान द्वारा प्ररूपित धर्म एवं तत्त्वों में शंका-संशय रूप आत्मा का परिणमन विचिकित्सा संज्ञा है ।

137- विचिकित्सा संज्ञा के दो प्रकार कौन से हैं ?

उत्तर- देशतः विचिकित्सा संज्ञा और सर्वतः विचिकित्सा संज्ञा ।

138- वास्तव में परलोक है या नहीं ? सर्वज्ञ के द्वारा प्ररूपित जीव आदि तत्त्व यथार्थ है या नहीं ? इस प्रकार का संशय होना कौन-सी संज्ञा है ?

उत्तर- सर्वतः विचिकित्सा संज्ञा ।


139- 22 परीषहों को सहने का, ब्रह्मचर्य पालन का, केश लुंचन आदि कायक्लेश सहने का फल मिलेगा या नहीं, इस प्रकार का संशय होना कौन-सी संज्ञा है ?

उत्तर- देशतः विचिकित्सा संज्ञा ।


140- मोहनीय कर्म के उदय से इष्ट वस्तु के न मिलने पर या उसका वियोग होने पर तथा अनिष्ट वस्तु का संयोग पाकर रोना, पीटना, विलाप आदि करना कौन-सी संज्ञा है ?

उत्तर- शोक संज्ञा ।


141- इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग से उत्पन्न होने वाली आत्मा की विभाव परिणति कौन-सी संज्ञा है ?

उत्तर- शोक संज्ञा ।


142- मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से कर्म क्षयजनक सर्वविरति तथा देशविरति रूप आत्मा की स्वभाव परिणति कौन-सी संज्ञा है ?

उत्तर- धर्म संज्ञा ।


143- जीवरक्षा, यतना, विवेक, उपयोग आदि व्यापारों से जीव की कौन-सी संज्ञा का ज्ञान होता है ?

उत्तर- धर्म संज्ञा ।

144- योनियाँ कितने प्रकार की हैं ?

उत्तर- प्रज्ञापना सूत्र के नवमें योनिपद में 3-3 भेद 4 प्रकार से बताते हुए कुल 12 भेद बताये हैं 

पहले प्रकार से योनि के तीन भेद  - शीत योनि, उष्ण योनि, शीतोष्ण योनि ।

दूसरे प्रकार से योनि के तीन भेद - सचित्त योनि, अचित्त योनि, सचित्ताचित्त योनि ।

तीसरे प्रकार से योनि के तीन भेद - संवृत्त योनि, विवृत्त योनि, संवृत्त-विवृत्त योनि ।

चौथे प्रकार से योनि के तीन भेद  - कूर्मोन्नत योनि, शंखावृत्ता योनि, वंशीपत्रा योनि ।

145- योनि क्या है ?

उत्तर - जीव औदारिक, वैक्रिय आदि शरीर वर्गणा के पुद्गलों को लेकर जिसमें मिश्रित होता है, संबंध करता है वह स्थान 'योनि' है अथवा जीव की उत्पत्ति का स्थान 'योनि' है ।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

श्रीपाल चरित्र कथा

🤔1
श्रीपाल राजा के समय कौन से तीर्थंकर परमात्मा का शासन चल रहा था ?
👉 मुनिसुव्रत स्वामी जी का

🤔2
राजा श्रेणिक ने श्रीपाल-चारित्र किसने सुना ?
👉 गणधर गौत्तम स्वामीजी से

🤔 3
श्रेणिक राजा कहाँ के राजा थे और उनकी राजधानी का नाम क्या था ?
👉 मगध देश के राजा थे और उनकी राजधानी राजगृही थी ।

🤔4
इतिहास में राजा श्रेणिक को और एक कौन से नाम से जानते हैँ ?
👉 बिम्बसार

🤔 5
सिद्धचक्र आराधना को हम और किस नाम से जानते हैँ?
👉 नवपद आराधना, ओली जी

🤔 6
नवपद में कौन से तीन तत्वों का समावेश हैँ?
👉 तीन तत्व, देव (अरिहन्त, सिद्ध भगवान), गुरू ( आचार्य, उपाध्याय,साधु), धर्म (सम्यग दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप)

🤔 7
राजा प्रजापाल कहाँ के शासक थे ?
👉 मालव देश, (उज्जैन, अवंति नगरी)

🤔 8
प्रजापाल राजा की दो रानियों के नाम ?
👉 सौभाग्य सुंदरी, रूप सुन्दरी

🤔 9
सौभाग्य सुंदरी और रूप सुंदरी कौन से धर्म को मानने वाली थी ?
👉 सौभाग्य सुंदरी वैष्णव धर्म और रूप सुंदरी जैन धर्म की उपासक ।

🤔 10
श्रीपाल- चारित्र के अनुसार गर्भस्थ जीव का मानसिक विकास, गर्भ में आने के कितने महीने बाद शुरू होता है ?
👉 6 महीने बाद

🤔 11
किनको  गर्भावस्था में इन्द्राणी के कुंडल पहनने की इच्छा हुई ?
👉 महावीर प्रभु की माता त्रिशला को

🤔 12
सौभाग्य सुंदरी और रूप सुंदरी, दोनों को एक - एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई, दोनों कन्याओं के क्रमशः नाम ?
👉 सौभाग्य सुंदरी की पुत्री सुर सुंदरी, रूप सुंदरी की पुत्री मयणा सुंदरी

🤔 13 
सुर सुंदरी और मयणा सुंदरी में बड़ी कौन थी ?
👉 सुर सुंदरी

🤔 14
सुर सुंदरी को पढ़ने के लियें किसके पास भेजा ?
👉 वेदांती पंडित शिवभूति

🤔 15
मयणा सुंदरी को पढ़ने के लियें किसके पास भेजा ?
👉 जैनागम के ज्ञाता पंडित सुबुद्धि

🤔 16
सुरसुन्दरी का विवाह किसके साथ हुवा ?
👉 शंखपुरी के राजकुमार अरिदमन के साथ 

🤔 17
मयणा सुंदरी का विवाह राजकुमार श्रीपाल के साथ हुवा, श्रीपाल को उस समय किस नाम से बुलाते थे ?
👉 उम्बर राणा

🤔 18
वैभव के सभी साधन होते हुवे भी हम उनके उपयोग से किस कारण वंचित होते हैं ?
👉 अंतराय कर्म के उदय के कारण

🤔 19
उम्बर राणा कितने कुष्ठी के नायक थे ?
👉 700 कुष्ठी के

🤔 20
क्या कुलीन कन्याए यह कहेगी कि  मैं------ साथ ही विवाह करुँगी ? ये शब्द किसने, किसको कहा ?
👉 मयणा सुंदरी ने अपने पिता प्रजापाल को।

🤔21
मन्दिर में प्रवेश करने के बाद निसिहि के पश्चात परमात्मा के समक्ष बोला जाने वाला पहला शब्द ?
👉 नमो जिणाणं

🤔 22
जिनेन्द्र परमात्मा के दर्शन करते समय कितने त्रिक और अभिगम का लक्ष्य रखना चाहिये ?
👉 10 त्रिक और 5 अभिगम

🤔 23
विवाह के अगले दिन श्रीपाल-मयणा जिन मंदिर में गये, वहां के मूलनायक में किनकी प्रतिमा थी ?
👉 श्री ऋषभ देव भगवान की

🤔 24
कोई भी व्यक्ति अगर भयंकर रोगग्रस्त हो तो क्या जिन मंदिर में प्रवेश कर सकता है ?
👉अगर घाव से रक्त, पिप या मुँह की लार आदि निरंतर बहते हो तो भाव पूजा कर सकते हैँ, अष्ट प्रकारी पूजा नहीं करनी चाहिये ।

🤔 25
प्रथम दिवस मंदिर जी में क्या अनोखी घटना हुवी ?
👉 भगवान के गले का पुष्प का हार और हाथ में रखा गुलदस्ता श्रीपाल के पास आ पहुँचे ।

🤔 26
श्रीपाल मयणा प्रथम बार जब उपाश्रय गए तो वहां कौन से आचार्य भगवंत विराज रहे थे ?
👉 आचार्य मुनिचंद्रसूरि ।

🤔 27
सिद्धचक्र आराधना सविधि कितने आयंबिल से होती हैं ?
👉 81 आयंबिल ( वर्ष में दो बार, साढ़े चार वर्ष में पूरी होती है )

🤔 28
मयणा सुंदरी ने नवपद ओली कब प्रारम्भ की ( तिथि )
👉 आश्विन शुक्ला सप्तमी से

🤔29
राजकुमार श्रीपाल के माता- पिता का नाम क्या था ?
👉 माता - कमलप्रभा, पिता -चम्पापुरी के राजा सिंहरथ

🤔 30
मयणा सुंदरी के मामा कौन थे ?
👉 राजा पुण्यपाल

🤔31
आर्त और रौद्र ध्यान से कौन सी गति का बंध होता है ?
👉 क्रमशः त्रियच और नरक गति

🤔 32
श्रीपाल के मामा कौन थे ?
👉 कोकण देश के राजा- वसुपाल

🤔 33
श्रीपाल के पिता के शुभ चिंतक प्रधानमंत्री ?
👉 मतिसागर

🤔 34
राजकुमार श्रीपाल की आयु कितनी थी, जब उनके पिता का देहांत हुवा ?
👉 पाँच वर्ष

🤔 35
सत्ता के लोभी, श्रीपाल के काका कौन थे ?
👉 अजितसेन

🤔 36
राजकुमार श्रीपाल ने विदेश भ्रमण कहाँ से प्रारम्भ किया ?
👉 अपने ससुराल, राजा प्रजापाल के महल से ।

🤔 37
वो कौन से शब्द थे जिन्होंने राजकुमार श्रीपाल को विदेश भ्रमण के लीये प्रोत्साहित किया ?
👉 ये हैं, अपने सरकार प्रजापाल के बेटी- जवाईं ।

🤔 38
श्रीपाल-चारित्र में चार प्रकार के मनुष्य बताये हैं, कौन से ?
👉 उत्तम, मध्यम, अधम और अधमाधम ।

🤔 39
अधमाधम मनुष्य किसे कहते हैं ?
👉 जो अपने श्वसुर के नाम से ख्याति प्राप्त करते हैं ।

🤔 40
जो पिता के नाम से ख्याति प्राप्त करते हैं, उन्हें किस प्रकार का मनुष्य कहा गया है ?
👉 मध्यम

🤔 41
राजकुमार श्रीपाल कौन से मुहुर्त में विदेश भ्रमण हेतु निकले ?
👉 विजय मुहुर्त

🤔 42
मयणा सुंदरी ने श्रीपाल के पुनः आगमन तक प्रतिदिन कौन सा तप किया ?
👉 प्रतिदिन एकासन 😊

🤔 43
विदेश भ्रमण हेतु जाते समय राजकुमार श्रीपाल का कौन सा स्वर चल रहा था ?
👉 चंद्र स्वर 👌

🤔 44
उज्जैन से प्रस्थान के बाद सबसे पहले उन्हें कौन मिला ?
👉 एक साधक तपस्वी ।

🤔 45
साधक ने राजकुमार श्रीपाल को क्या भेंट दी ?
👉 दो दिव्य औषधि, जल तरणी और शस्त्र हरणी ।

🤔 46
साधक और श्रीपाल को आगे जाने पर कौन मिले ?
👉 दो कीमियागर ( धातुवादी )

🤔 47
किमियागार क्या कर रहे थे ?
👉 स्वर्ण-सिद्धि

🤔 48
राजकुमार श्रीपाल, धवल सेठ से कौन से नगर में मिले ?
👉 भरुंच नगर में । 

🤔 49
धवल सेठ कहाँ के रहने वाले थे ?
👉 कौसंबी निवासी

🤔 50
धवल सेठ ने भरुंच में कितने जहाज बनवाये ?
👉 500
🤔 51
भरुंच में धवल सेठ के जहाज स्तंभित होने पर निमित्तक ने क्या उपाय बताया ?
👉 एक बत्तीस लक्षण पुरुष का बलिदान 🙄

🤔 52
राजकुमार श्रीपाल को सर्वप्रथम अपनी तलवार का उपयोग कहाँ करना पड़ा ?
👉 भरुंच में😊 

🤔 53
धवल सेठ ने भरुंच में अपने स्तंभित जहाज को मुक्त करने के लिये राजकुमार श्रीपाल को कितनी स्वर्ण मुद्राए दी ?
👉 एक लाख स्वर्ण मुद्राए 👌

🤔 54
धवल सेठ ने श्रीपाल जी से जहाज में स्थान देने का मासिक कितना किराया  लिया 😃 ?
👉 100 स्वर्ण मुद्राए 🙄
 
🤔55
भरुंच से रवाना होकर, जहाज का अगला पड़ाव कौन सा नगर था 😐 ?
👉 बब्बरकूल😊

🤔 56
बब्बरकूल में उस समय कौन से राजा का शासन था ?
👉 महाकाल

🤔 57
महाकाल राजा ने धवल सेठ को बंदी क्यों बनाया ?
👉 कर न देने और राज्य कर्मचारियों पर हमला करने के कारण

🤔 58
बब्बरकूल में धवल सेठ और उनके माल से भरे जहाज, महाकाल राजा से मुक्त कराने के लिये, धवल सेठ ने श्रीपाल जी को क्या दिया ?
👉 माल से भरे हुवे अपने 250 जहाज👍

🤔 59
विदेश भ्रमण में राजकुमार श्रीपाल का सर्वप्रथम किससे विवाह हुवा 👫
👉 बब्बरकूल नरेश महाकाल की पुत्री मदनसेना से🙏�

🤔 60
बब्बरकूल से प्रस्थान कर श्रीपाल जी और धवल सेठ ने अगला पड़ाव कहाँ डाला ?
👉 रत्न द्वीप

🤔 61
रत्न द्वीप में राजकुमार श्रीपाल को, रत्नसंचया नगरी चलने हेतु किसने आग्रह किया ?
👉 जिनदास श्रावक ने

🤔 62
रत्नसंचया नगर के राजा कौन थे ?
👉 विद्याधर कनककेतु

🤔 63
राजा कनककेतु को कौन से धर्म पर श्रद्धा थी ?
👉 जिनेश्वर परमात्मा पर, ( जैन )

64
🤔श्रीपाल के कुल कितनी रानियां थी?
👉🏻 14

65
🤔सुरसुन्दरी के पति का क्या नाम था,और वह कहाँ का राजकुमार था?
👉🏻अरिदमन ,शंखपुर का

🤔66
राजा श्रेणिक ने श्रीपाल-चारित्र किसने सुना ?
👉 गणधर गौत्तम स्वामीजी से

🤔 67
सौभाग्य सुंदरी और रूप सुंदरी कौन से धर्म को मानने वाली थी ?
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शुक्रवार, 29 मार्च 2019

संस्कृत के प्रत्यय क्या होते हैं :- संस्कृत व्याकरण में जो प्रत्यय शब्दों और मूल धातुओं से जोड़े जाते हैं वे संस्कृत के प्रत्यय कहलाते हैं ।

(क) संस्कृत के प्रत्यय क्या होते हैं :- संस्कृत व्याकरण में जो प्रत्यय शब्दों और मूल धातुओं से जोड़े जाते हैं वे संस्कृत के प्रत्यय कहलाते हैं ।


जैसे :- त – आगत , विगत , कृत ।


संस्कृत प्रत्यय के प्रकार :-


1. कृत प्रत्यय

2. तद्धित प्रत्यय


1. कृत प्रत्यय क्या होते हैं :- वे प्रत्यय जो क्रिया या धातु के अंत में लगकर एक नए शब्द बनाते हैं उन्हें कृत प्रत्यय कहा जाता है ।कृत प्रत्यय से मिलकर जो प्रत्यय बनते है उन्हें कृदंत प्रत्यय कहते हैं । ये प्रत्यय क्रिया और धातु को नया अर्थ देते हैं । कृत प्रत्यय के योग से संज्ञा और विशेषण भी बनाए जाते हैं ।


जैसे :- लिख +अक = लेखक


धातु + प्रत्यय = उदाहरण इस प्रकार हैं :-


(i) लेख, पाठ, कृ, गै , धाव , सहाय , पाल + अक = लेखक , पाठक , कारक , गायक , धावक , सहायक , पालक आदि ।


(ii) पाल् , सह , ने , चर , मोह , झाड़ , पठ , भक्ष + अन = पालन , सहन , नयन , चरण , मोहन , झाडन , पठन , भक्षण आदि ।


(iii) घट , तुल , वंद ,विद + ना = घटना , तुलना , वन्दना , वेदना आदि ।


(iv) मान , रम , दृश्, पूज्, श्रु + अनिय = माननीय, रमणीय, दर्शनीय, पूजनीय, श्रवणीय आदि ।


(v) सूख, भूल, जाग, पूज, इष्, भिक्ष् , लिख , भट , झूल +आ = सूखा, भूला, जागा, पूजा, इच्छा, भिक्षा , लिखा ,भटका, झूला आदि ।


(vi) लड़, सिल, पढ़, चढ़ , सुन + आई = लड़ाई, सिलाई, पढ़ाई, चढ़ाई , सुनाई आदि.

(vii) उड़, मिल, दौड़ , थक, चढ़, पठ +आन = उड़ान, मिलान, दौड़ान , थकान, चढ़ान, पठान आदि ।


(viii) हर, गिर, दशरथ, माला + इ = हरि, गिरि, दाशरथि, माली आदि ।


(ix) छल, जड़, बढ़, घट + इया = छलिया, जड़िया, बढ़िया, घटिया आदि ।


(x) पठ, व्यथा, फल, पुष्प +इत = पठित, व्यथित, फलित, पुष्पित आदि ।


(xi) चर्, पो, खन् + इत्र = चरित्र, पवित्र, खनित्र आदि ।


(xii) अड़, मर, सड़ + इयल = अड़ियल, मरियल, सड़ियल आदि ।


(xiii) हँस, बोल, त्यज्, रेत , घुड , फ़ांस , भार + ई = हँसी, बोली, त्यागी, रेती , घुड़की, फाँसी , भारी आदि ।


(xiv) इच्छ्, भिक्ष् + उक = इच्छुक, भिक्षुक आदि ।


(xv) कृ, वच् + तव्य = कर्तव्य, वक्तव्य आदि ।


(xvi) आ, जा, बह, मर, गा + ता = आता, जाता, बहता, मरता, गाता आदि ।


(xvii) अ, प्री, शक्, भज + ति = अति, प्रीति, शक्ति, भक्ति आदि ।


(xviii) जा, खा + ते = जाते, खाते आदि ।


(xix) अन्य, सर्व, अस् + त्र = अन्यत्र, सर्वत्र, अस्त्र आदि ।


(xx) क्रंद, वंद, मंद, खिद्, बेल, ले , बंध, झाड़ + न = क्रंदन, वंदन, मंदन, खिन्न, बेलन, लेन , बंधन, झाड़न आदि ।


(xxi) पढ़, लिख, बेल, गा + ना = पढ़ना, लिखना, बेलना, गाना आदि ।


(xxii) दा, धा + म = दाम, धाम आदि ।


(xxiii) गद्, पद्, कृ, पंडित, पश्चात्, दंत्, ओष्ठ् , दा , पूज + य = गद्य, पद्य, कृत्य, पाण्डित्य, पाश्चात्य, दंत्य, ओष्ठ्य , देय , पूज्य आदि ।


(xxiv) मृग, विद् + या = मृगया, विद्या आदि ।


(xxv) गे +रु = गेरू आदि ।



(xxvi) देना, आना, पढ़ना , गाना + वाला = देनेवाला, आनेवाला, पढ़नेवाला , गानेवाला आदि ।


(xxvii) बच, डाँट , गा, खा ,चढ़, रख, लूट, खेव + ऐया \ वैया = बचैया, डटैया, गवैया, खवैया ,चढ़ैया, रखैया, लुटैया, खेवैया आदि ।


(xxviii) होना, रखना, खेवना + हार = होनहार, रखनहार, खेवनहार आदि ।


कृत प्रत्यय के भेद :-

1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय

2. विशेषणवाचक कृत प्रत्यय

3. भाववाचक कृत प्रत्यय

4. कर्मवाचक कृत प्रत्यय

5. करणवाचक कृत प्रत्यय

6. क्रियावाचक कृत प्रत्यय


1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिस शब्द से किसी के कार्य को करने वाले का पता चले उसे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


अक = लेखक , नायक , गायक , पाठक

अक्कड = भुलक्कड , घुमक्कड़ , पियक्कड़

आक = तैराक , लडाक

आलू = झगड़ालू

आकू = लड़ाकू , कृपालु , दयालु

आड़ी = खिलाडी , अगाड़ी , अनाड़ी

इअल = अडियल , मरियल , सडियल

एरा = लुटेरा , बसेरा

ऐया = गवैया , नचैया

ओडा = भगोड़ा

वाला = पढनेवाला , लिखनेवाला , रखवाला

हार = होनहार , राखनहार , पालनहार

ता = दाता , गाता , कर्ता , नेता , भ्राता , पिता , ज्ञाता ।

2. विशेषण वाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्यय के क्रियापदों से विशेषण शब्द की रचना होती है उसे विशेषण वाचक कृत प्रत्यय कहते है ।


जैसे :-


त = आगत ,विगत ,कृत

तव्य = कर्तव्य ,गन्तव्य

य = नृत्य ,पूज्य , खाघ

अनीय =पठनीय ,पूजनीय ,शोचनीय ।

3. भाववाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- भाववाचक कृत प्रत्यय वे होते हैं जो क्रिया से भाववाचक संज्ञा का निर्माण करते हैं ।


जैसे :-


अन = लेखन , पठन , गमन , मनन , मिलन

ति = गति , रति , मति

अ = जय , लेख , विचार , मार , लूट , तोल

आवा = भुलावा , छलावा , दिखावा , बुलावा , चढावा

आई = कमाई , चढाई , लड़ाई , सिलाई , कटाई , लिखाई

आहट = घबराहट , चिल्लाहट

औती = मनौती , फिरौती , चुनौती , कटौती

अंत = भिडंत , गढंत

आवट = सजावट , बनावट , रुकावट , मिलावट

ना = लिखना , पढना

आन = उड़ान , मिलान , उठान , चढ़ान

आव = चढ़ाव , घुमाव , कटाव

आवट = सजावट , लिखावट , मिलावट

4. कर्मवाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिस प्रत्यय से बनने वाले शब्दों से किसी कर्म का पता चले उसे कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


औना = बिछौना , खिलौना

ना = सूँघना , पढना , खाना

नी = सुँघनी , छलनी

गा = गाना ।

5. करणवाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिस प्रत्यय की वजह से बने शब्द से क्रिया के करण का बोध होता है उसे करणवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


आ = भटका , भूला , झूला

ऊ = झाड़ू

ई = रेती , फांसी , भारी , धुलाई

न = बेलन , झाडन , बंधन

नी = धौंकनी , करतनी , सुमिरनी , छलनी , फूंकनी , चलनी

6. क्रिया वाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :– जिस प्रत्यय के कारण बने शब्दों से क्रिया के होने का भाव पता चले उसे क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


ता = डूबता , बहता , चलता

या = खोया , बोया

आ = सुखा , भूला , बैठा

ना = दौड़ना , सोना

कर = जाकर , देखकर


कृत प्रत्यय के प्रकार :-

1. विकारी कृत प्रत्यय

2. अविकारी कृत प्रत्यय


1. विकारी कृत प्रत्यय क्या होता है :- विकारी कृत प्रत्यय में शुद्ध संज्ञा तथा विशेषण बने होते हैं इसलिए इसे विकारी कृत प्रत्यय कहते हैं ।


विकारी कृत प्रत्यय के भेद :-


1. क्रियार्थक संज्ञा

2. कृतवाचक संज्ञा

3. वर्तमान कालिक कृदंत

4. भूतकालिक कृदंत


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1. क्रियार्थक संज्ञा क्या होती है :- वह संज्ञा जो क्रिया के मूल रूप में होती है और क्रिया का अर्थ देती है अथार्त को का अर्थ बताने वाला वह शब्द जो क्रिया के रूप में उपस्थित होते हुए भी संज्ञा का अर्थ देता है वह क्रियाथक संज्ञा कहलाती है ।


2. कृतवाचक संज्ञा क्या होती है :- वे प्रत्यय जिनके जुड़ने पर कार्य करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक संज्ञा कहते हैं ।


3. वर्तमान कालिक कृदंत क्या होती है :- जब हम एक काम को करते हुए दूसरे काम को साथ में करते हैं तो पहले वाली की गई क्रिया को वर्तमान कालिक कृदंत कहते हैं ।


4. भूतकालिक कृदंत क्या होता है :- जब सामान्य भूतकालिक क्रिया को हुआ , हुए , हुई आदि को जोड़ने से भूतकालिक कृदंत बनता है ।


2. अविकारी कृत प्रत्यय क्या होता है :- ऐसे कृत प्रत्यय जिनकी वजह से क्रियामूलक विशेषण और अव्यय बनते है उन्हें अविकारी कृत प्रत्यय कहते हैं ।


2. तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जब संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण के अंत में प्रत्यय लगते हैं उन शब्दों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं तद्धित प्रत्यय से मिलाकर जो शब्द बनते हैं उन्हें तद्धितांत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :- सेठ+आनी = सेठानी ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) पछताना, जगना , पंडित , चतुर , ठाकुर + आइ = पछताई ,जगाई ,पण्डिताई ,चतुराई , ठकुराई आदि ।


(ii) पण्डित, ठाकुर + आइन = पण्डिताइन, ठकुराइन आदि ।


(iii) पण्डित, ठाकुर, लड़, चतुर, चौड़ा ,अच्छा + आई = पण्डिताई, ठकुराई, लड़ाई, चतुराई, चौड़ाई , अच्छाई आदि ।


(iv) सेठ, नौकर + आनी = सेठ, नौकर आदि ।


(v) बहुत, पंच, अपना +आयत = बहुतायत, पंचायत, अपनायत आदि ।


(vi) लोहा, सोना, दूध, गाँव + आर \आरा = लोहार, सुनार, दूधार, गँवार आदि ।


(vii) चिकना, घबरा, चिल्ल, कड़वा + आहट = चिकनाहट, घबराहट, चिल्लाहट, कड़वाहट आदि ।


(viii) फेन, कूट, तन्द्र, जटा, पंक, स्वप्न, धूम + इल = फेनिल, कुटिल, तन्द्रिल, जटिल, पंकिल, स्वप्निल, धूमिल आदि ।


(ix) कन्, वर्, गुरु, बल + इष्ठ = कनिष्ठ, वरिष्ठ, गरिष्ठ, बलिष्ठ आदि ।


(x) सुन्दर, बोल, पक्ष, खेत, ढोलक, तेल, देहात + ई = सुन्दर, बोल, पक्ष, खेत, ढोलक, तेल, देहात आदि ।


(xi) ग्राम, कुल + ईन = ग्रामीण, कुलीन आदि ।


(xii)भवत्, भारत, पाणिनी, राष्ट्र + ईय = भवदीय, भारतीय, पाणिनीय, राष्ट्रीय आदि ।


(xiii) बच्चा, लेखा, लड़का + ए = बच्चे, लेखे, लड़के आदि ।


(xiv) अतिथि, अत्रि, कुंती, पुरुष, राधा + एय = आतिथेय, आत्रेय, कौंतेय, पौरुषेय, राधेय आदि ।


(xv) फुल, नाक +एल = फुलेल, नकेल आदि ।


(xvi) डाका, लाठी + ऐत = डकैत, लठैत आदि ।


(xvii) अंध, साँप, बहुत, मामा, काँसा, लुट, सेवा + एरा/ऐरा = अँधेरा, सँपेरा, बहुतेरा, ममेरा, कसेरा, लुटेरा , सवेरा आदि ।


(xviii) खाट, पाट, साँप + ओला = खटोला, पटोला, सँपोला आदि ।



(xix) बाप, ठाकुर, मान + औती = बपौती, ठकरौती, मनौती आदि ।


(xx) बिल्ला, काजर + औटा = बिलौटा, कजरौटा आदि ।


(xxi) धम, चम, बैठ, बाल, दर्श, ढोल , लल + क = धमक, चमक, बैठक, बालक, दर्शक, ढोलक , ललक आदि ।


(xxii) विशेष, ख़ास + कर = विशेषकर, ख़ासकर आदि ।


(xxiii) खट, झट + का = खटका, झटका आदि ।


(xxiv) भ्राता, दो + जा = भतीजा, दूजा आदि ।


(xxv) चाम, बाछा, पंख, टाँग + डा/डी = चमड़ा, बछड़ा, पंखड़ी, टँगड़ी आदि ।


(xxvi) रंग, संग, खप + त = रंगत, संगत, खपत आदि ।


(xxvii) अद्य + तन = अद्यतन आदि ।


(xxviii) गुरु, श्रेष्ठ + तर = गुरुतर, श्रेष्ठतर आदि ।


(xxix) अंश, स्व , आ +त: = अंशतः, स्वतः , अत: आदि ।


(xxx) कम, बढ़, चढ़ + ती = कमती, बढ़ती, चढ़ती आदि ।


(xxxi) ऐ , कै , वै + सा = ऐसा , कैसा , वैसा आदि ।


(xxxii) लेश , रंच + मात्र = लेशमात्र , रंचमात्र आदि ।


तद्धित प्रत्यय के प्रकार :-

1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय

2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय

3. ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय

4. संबंध वाचक तद्धित प्रत्यय

5. अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय

6. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय

7. स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय

8. अव्ययवाचक तद्धित प्रत्यय

9. सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय

10. गणनावाचक तद्धति प्रत्यय

11. स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय

12. तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय

13. पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय


1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्यय को जोड़ने से कार्य को करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं अथार्त जो प्रत्यय संज्ञा , सर्वनाम तथा विशेषण के साथ मिलकर करने वाले का या कर्तृवाचक शब्द को बनाते हैं उसे कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) सोना , लोहा , कह , चम + आर = सुनार , लुहार , कहार , चमार आदि ।


(ii) जुआ + आरी = जुआरी आदि ।


(iii) मजाक , रस , दुःख , आढत , मुख , रसोई + इया = मजाकिया , रसिया , दुखिया , आढतिया , मुखिया , रसोईया आदि ।


(iv) सब्जी , टोपी , घर , गाड़ी , पान + वाला = सब्जीवाला , टोपीवाला , घरवाला , गाड़ीवाला ,पानीवाला आदि ।


(v) पालन + हार = पालनहार आदि ।


(vi) समझ , ईमान , दुकान , कर्ज + दार = समझदार , ईमानदार , दुकानदार , कर्जदार आदि ।


(vii) तेल , भेद , रोग + ई = तेली , भेदी , रोगी आदि ।


(viii) घास , कसा , ठठ , लुट + एरा = घसेरा , कसेरा , ठठेरा , लुटेरा आदि ।


(ix) लकड , पानी , मनि + हारा = लकडहारा , पनिहारा , मनिहारा आदि ।


(x) पाठ , लेख , लिपि + क = पाठक , लेखक , लिपिक आदि ।


(xi) पत्र , कला , चित्र + कार = पत्रकार , कलाकार , चित्रकार आदि ।


(xii) मछु , गेरू , ठलु + आ = मछुआ , गेरुआ , ठलुआ आदि ।


(xiii) मशाल , खजान , मो + ची = मशालची , खजानची , मोची आदि ।


(xiv) कारी , बाजी , जादू + कारीगर , बाजीगर , जादूगर आदि ।


2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- इस प्रत्यय में भाव प्रकट होता है ।इसमें प्रत्यय लगने की वजह से कहीं कहीं पर आदि स्वर की वृद्धि हो जाया करती है । जो प्रत्यय संज्ञा तथा विशेषण के साथ जुडकर भाववाचक संज्ञा को बनाते हैं उसे भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) देवता ,मनुष्य , पशु , महा , गुरु , लघु + त्व = देवत्व , मनुष्यत्व , पशुत्व , महत्व , गुरुत्व , लघुत्व आदि ।


(ii) बच्चा , लडक , छुट , काला + पन = बचपन , लडकपन , छुटपन , कालापन आदि ।


(iii) सज्जा +वट = सजावट आदि ।


(iv) चिकना + हट = चिकनाहट आदि ।


(v) रंग + त = रंगत आदि ।


(vi) मीठा + आस = मिठास आदि ।


(vii) बुलाव , सराफ , चूर + आ = बुलावा , सराफा , चूरा आदि ।


(viii) भला , बुरा , कठिन , चतुर , ऊँचा + आई = भलाई , बुराई , कठिनाई , चतुराई , ऊँचाई आदि ।


(ix) बुढा , मोटा + आपा = बुढ़ापा , मोटापा आदि ।


(x) खट , मीठा , भडा + आस = खटास , मिठास , भडास आदि ।


(xi) कडवा , घबरा , झल्ला , चिकना + आहट = कडवाहट , घबराहट , झल्लाहट , चिकनाहट आदि ।


(xii) लाली , महा , अरुण , गरी + इमा = लालिमा , महिमा , अरुणिमा , गरिमा आदि ।


(xiii) गर्म , खेत , सर्द , गरीब + ई = गर्मी , खेती , सर्दी , गरीबी आदि ।


(xiv) सुंदर , मूर्ख , मनुष्य , लघु , गुरु , सम , कवि , एक , बन्धु + ता = सुन्दरता , मूर्खता , मनुष्यता , लघुता , गुरुता , समता , कविता , एकता , बन्धुता आदि ।


(xv) बाप , मान + औती =बपौती , मनौती आदि ।


(xvi) लाघ , गौर , पाट + अव = लाघव , गौरव , पाटव आदि ।


(xvii) पंडित , धैर , चतुर , मधु + य = पांडित्य , धैर्य , चातुर्य , माधुर्य आदि ।


(xviii) चौड़ा +आन = चौडान आदि ।


(xix) अपना + आयत = अपनायत आदि ।


(xx) छूट + आरा = छुटकारा आदि ।


3. ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्यय शब्दों से लघुता , प्रियता , हीनता का पता चलता हो उसे ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) ढोल + क = ढोलक आदि ।


(ii) छाता + री = छतरी आदि ।


(iii) बूढी , लोटा , डिबा , खाट + इया = बुढिया , लुटिया , डिबिया , खटिया आदि ।


(iv) टोप , कोठर , टोकन , ढोलक , मण्डल , टोकरा , पहाड़ , घन + ई =टोपी , कोठरी , टोकनी , ढोलकी , मण्डली , टोकरी , पहाड़ी , घण्टी आदि ।


(v) छोटा , कन + की = छोटकी , कनकी आदि ।


(vi) चोरी , कालू + टा = चोट्टा , कलूटा आदि ।


(vii) दुःख , बछ + डा = दुखड़ा , बछड़ा आदि ।


(viii) पाग , टूक , टांग + डी = पगड़ी , टुकड़ी , टंगड़ी आदि ।


(ix) खाट + ली = खटोली आदि ।


(x) बच्चा + वा = बचवा आदि ।


(xi) लँगोट , कचौट , बहु + टी = लंगोटी , कछौटी , बहूटी आदि ।


(xii) खाट , साँप + ओला = खटोला , संपोला आदि ।


(xiii) ठाकुर +आ = ठकुरा आदि ।


(xiv) टीका + ली = टिकली आदि ।


(xv) मरा + सा = मरासा आदि ।


4. संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के लगने से संबंध का पता लगता है उसे संबंध वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं इसमें कभी कभी आदि स्वर की वृद्धि हो जाती है ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) नाना + हाल = ननिहाल आदि ।


(ii) नाक + एल = नकेल आदि ।


(iii) ससुर + आल = ससुराल आदि ।


(iv) बाप + औती = बपौती आदि ।


(v) लखनऊ , पंजाब , गुजरात , बंगाल , सिंधु + ई = लखनवी , पंजाबी , गुजराती , बंगाली , सिंधी आदि ।


(vi) फूफा , मामा , चाचा + ऐरा = फुफेरा , ममेरा , चचेरा आदि ।


(vii) भाई , बहन + जा = भतीजा , भानजा आदि ।


(viii) पटना , कलकता , जबलपुर , अमृतसर + इया = पटनिया , कलकतिया , जबलपुरिया , अमृतसरिया आदि ।


(ix) शरीर , नीति , धर्म , अर्थ , लोक , वर्ष , एतिहास + इक = शारीरिक , नैतिक , धार्मिक , आर्थिक , लौकिक , वार्षिक , ऐतिहासिक आदि ।


(x) दया , श्रद्धा + आलु = दयालु , श्रद्धालु आदि ।


(xi) फल , पीड़ा , प्रचल , दुःख , मोह + इत = फलित , पीड़ित , प्रचलित , दुखित , मोहित आदि ।


(xii) रस , रंग , जहर + ईला = रसीला , रंगीला , जहरीला आदि ।


(xiii) भारत , प्रान्त , नाटक , भवद + ईय = भारतीय , प्रांतीय , नाटकीय , भवदीय आदि ।


(xiv) विष + ऐला = विषैला आदि ।


(xv) कठिन + तर = कठिनतर आदि ।


(xvi) बुद्धि + मान = बुद्धिमान आदि ।


(xvii) पुत्र , मातृ + वत = पुत्रवत , मातृवत आदि ।


(xviii) इक + हरा = इकहरा आदि ।


(xix) नन्द + ओई = ननदोई आदि ।


(xx) ग्राम , काम , हास् , भव + य = ग्राम्य , काम्य , हास्य , भव्य आदि ।


(xxi) जट , फेन , बोझ , पंक + इल = जटिल , फेनिल , बोझिल , पंकिल आदि ।


(xxii) स्वर्ण , अंत , रक्ति + इम = स्वर्णिम , अंतिम , रक्तिम आदि ।


5. अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के जुड़ने से शब्द के आंतरिक रूप में परिवर्तन हो जाता है और शब्द का अर्थ अपत्य हो जाता है । इनसे संतान या वंश में पैदा हुए व्यक्ति का बोध होता है उसे अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।इस प्रत्यय में कभी कभी आदि स्वर की वृद्धि हो जाती है ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार से हैं :-


(i) वसुदेव , मनु , कुरु , रघु , यदु , विष्णु , कुन्ती + अ = वासुदेव , मानव , कौरव , राघव , यादव , वैष्णव , कौन्तेय आदि ।


(ii) नर + आयन = नारायण आदि ।


(iii) राधा , गंगा , भागिन + एय = राधेय , गांगेय , भागिनेय आदि ।


(iv) दिति , आदित + य = दैत्य , आदित्य आदि ।


(v) दशरथ , वाल्मिक , सौमित्र , जनक , द्रोपद , गांधार + ई = दाशरथि , वाल्मिकी , सौमित्री , जानकी , द्रोपदी , गांधारी आदि ।


6. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से पदार्थ के गुणों का बोध होता है उसे गुणवाचक प्रत्यय कहते हैं । इस प्रत्यय से संज्ञा शब्द गुन्वाची हो जाता है ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) भूख , प्यास , ठंड , मीठ + आ = भूखा , प्यासा , ठंडा , मीठा आदि ।


(ii) निशा + अ = नैश आदि ।


(iii) शरीर , नगर , इतिहास + इक = शारीरिक , नागरिक , ऐतिहासिक आदि ।


(iv) पक्ष , धन , लोभ , क्रोध , गुण , विद्याथ , सुख , ज्ञान , जंगल + ई = पक्षी , धनी , लोभी , क्रोधी , गुणी , विद्यार्थी , सुखी , ज्ञानी , जंगली आदि ।


(v) बुद्ध + ऊ = बुद्धू आदि ।


(vi) छूत + हा = छुतहर आदि ।


(vii) गांजा + एडी = गंजेड़ी आदि ।


(viii) शाप , पुष्प , आनन्द , क्रोध + इत = शापित , पुष्पित , आनन्दित , क्रोधित आदि ।


(ix) लाल + इमा = लालिमा आदि ।


(x) वर + इष्ठ = वरिष्ठ आदि ।


(xi) कुल + ईन = कुलीन आदि ।


(xii) मधु + र = मधुर आदि ।


(xiii) वत्स + ल = वत्सल आदि ।


(xiv) माया + वी = मायावी आदि ।


(xv) कर्क + श = कर्कश आदि ।


(xvi) चमक , भडक , रंग , सज + ईला = चमकीला , भडकीला , रंगीला , सजीला आदि ।


(xvii) वांछन , अनुकरण , भारत , रमण + ईय = वांछनीय , अनुकरणीय , भारतीय , रमणीय आदि ।


(xviii) कृपा , दया , शंका + लू = कृपालु , दयालु , शंकालु आदि ।


(xix) विष , कस + ऐला = विषैला , कसैला आदि ।


(xx) दया , कुल + वंत = दयावन्त , कुलवंत आदि ।


(xxi) गुण , रूप , बल , विद + वान = गुणवान , रूपवान , बलवान , विद्वान् आदि ।


(xxii) बुद्धि , शक्ति , गति , आयुष + मान = बुद्धिमान , शक्तिमान , गतिमान , आयुष्मान आदि ।


(xxiii) पश्चात् , पौर्वा , दक्षिण + त्य = पश्चात्य , पौर्वात्य , दक्षिणात्य आदि ।


(xxiv) सुन + हरा = सुनहरा आदि ।


(xxv) रूप + हला = रुपहला आदि ।


7. स्थान वाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से स्थान का पता चलता है वहाँ पर स्थान वाचक तद्धित प्रत्यय होता है ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) गुजरात , पंजाब , बंगाल , जर्मन + ई = गुजरती , पंजाबी , बंगाली , जर्मनी आदि ।


(ii) पटना , मुम्बई , नागपुर , जयपुर + इया = पटनिया , मुम्बईया , नागपुरिया , जयपुरिया आदि ।


(iii) चारा + गाह = चारागाह आदि ।


(iv) आगा + आड़ी = अगाड़ी आदि ।


(v) सर्व , यद , तद + त्र = सर्वत्र , यत्र , तत्र आदि ।


(vi) डेरे , दिल्ली , बनारस , सुरत , चाय + वाला = डेरेवाला , दिल्लीवाला , बनारसवाला , सुरतवाला , चायवाला आदि ।


(vii) कलक , तिरहु + तिया = कलकतिया , तिरहुतिया आदि ।


8. अव्ययवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है ;- संज्ञा , सर्वनाम और विशेषण आदि पदों के अंत में आँ, अ ओं , तना , भर आदि बहुत से प्रत्यय जोडकर अव्यय वाचक तद्धित प्रत्यय बनाए जाते हैं ।


पद + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) सर्व + दा = सर्वदा आदि ।


(ii) एक + त्र = एकत्र आदि ।


(iii) कोस + ओं = कोसों आदि ।


(iv) आप + स = आपस आदि ।


(v) यह + आँ = यहाँ आदि ।


(vi) दिन + भर = दिनभर आदि ।


(vii) धीर + ए = धीरे आदि ।


(viii) तड़का + ए = तडके आदि ।


(ix) पीछा + ए = पीछे आदि ।


9. सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों को जोड़ने से बने हुए शब्दों से समानता का पता चले उन्हें सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) सुन , रूप + हरा = सुनहरा , रूपहरा आदि ।


(ii) पीला , नीला , काला + सा = पीला सा , नीला सा , काला सा आदि ।


10. गणना वाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों को जोड़ने से शब्दों में संख्या का पता चले उसे गणना वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) पह + ला = पहला आदि ।


(ii) दुस , तीन + रा = दूसरा , तीसरा आदि ।


(iii) इक , दु , ति + हरा = इकहरा , दुहरा , तिहरा आदि ।


(iv) पांच , सात , दस + वाँ = पांचवां , सातवाँ , दसवां आदि ।


(v) चौ +था = चौथा आदि ।


(vi) दो +गुना = दोगुना आदि ।


11. स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :– जिन प्रत्यय की वजह से संज्ञा , सर्वनाम और विशेषण के साथ लगकर उनके स्त्रीलिंग होने का भेद उत्पन्न हो उन्हें स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय कहते हैं अथार्त जिन प्रत्ययों को लगाने से स्त्री जाति का बोध हो उसे स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) देवा , जेठ , नौकर + आनी = देवरानी , जेठानी , नौकरानी आदि ।


(ii) रूद्र , इंद्र + आणी = रुद्राणी , इन्द्राणी आदि ।


(iii) देव , लड़का + ई = देवी , लडकी आदि ।


(iv) सुत , प्रिय ,छात्र , अनुज + आ =सुता , प्रिया , छात्रा , अनुजा आदि ।


(v) धोबी , बाघ , माली + इन = धोबिन , बाघिन , मालिन आदि ।


(vi) ठाकुर , मुंशी + आइन = ठकुराइन , मुंशियाइन आदि ।


(vii) शेर , मोर + नी = शेरनी , मोरनी आदि ।


12. तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- दो या ज्यादा वस्तुओं में श्रेष्ठता बताने के लिए तारतम्य वाचक तद्धित प्रत्यय प्रयोग किया जाता है ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) अधिक , गुरु , लघु + तर = अधिकतर , गुरुतर , लघुतर आदि ।


(ii) सुंदर , अधिक , लघु + तम = सुन्दरतम , अधिकतम , लघुतम आदि ।


(iii) गर , वर + ईय = गरिय , वरीय आदि ।


(iv) गर , वर , कन + इष्ठ = गरिष्ठ , वरिष्ठ , कनिष्ठ आदि ।


13. पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों को लगाने से शब्द में संख्या की पूर्णता का बोध होता है उसे ही पूर्णता वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) प्रथ , पंच , सप्त , नव , दश + म = प्रथम , पंचम , सप्तम , नवम , दशम आदि ।


(ii) चतुर +थ = चतुर्थ आदि ।


(iii) पष + ठ = पष्ठ आदि ।


(iv) द्वि , तृ + तीय = द्वितीय , तृतीय आदि ।


(ख) हिंदी के प्रत्यय क्या होते हैं :-

हिंदी के प्रत्ययों को भी संस्कृत के प्रत्ययों की तरह ही जोड़ा जाता है लेकिन इन दोनों में इतना अंतर होता है की संस्कृत में कृत और तद्धित प्रत्यय होते हैं लेकिन हिंदी में तद्भव और देशज प्रत्यय होते हैं । हिंदी के भी अनेक प्रत्ययों को प्रयोग किया जाता है ।इतिहास के अनुसार हिंदी के प्रत्ययों को चार भागों में बांटा गया है ।


हिंदी के भाग :-


1. तत्सम प्रत्यय

2. तद्भव प्रत्यय

3. देशज प्रत्यय

4. विदेशज प्रत्यय


1. तत्सम प्रत्यय :-

प्रत्यय = अर्थ = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) आ – ( स्त्री प्रत्यय , भाववाचक प्रत्यय ) – आदरनीया , प्रिया , माननीया , सुता , इच्छा , पूजा आदि ।


(ii) आनी – ( स्त्री प्रत्यय ) – देवरानी , सेठानी , नौकरानी , भवानी , मेहतरानी आदि ।


(iii) आलु – ( विशेषण प्रत्यय , वाला ) – कृपालु , दयालु , निद्रालु , श्रद्धालु आदि ।


(iv) इत – ( विशेषण प्रत्यय , युक्त ) – पल्लवित , पुष्पित , फलित , हर्षित , निर्मित आदि ।


(v) इमा – ( भाववाचक प्रत्यय ) – गरिमा , मधुरिमा , लालिमा , महिमा , नीलिमा आदि ।


(vi) इक – ( विशेषण प्रत्यय , संज्ञा प्रत्यय ) – दैनिक , वैज्ञानिक , वैदिक , लौकिक , भौतिक आदि ।


(vii) क – (स्वार्थ , समूह ) – घटक , ठंडक , भटक , शतक , सप्तक आदि ।


(viii) कार – (लिखने वाला , बनाने वाला , वाला ) – पत्रकार , जानकार शिल्पकार आदि ।


(ix) ज – ( जन्मा हुआ ) – अंडज , पिंडज , जलज , पंकज , देशज , विदेशज आदि ।


(x) जीवी – ( जीनेवाला ) – परजीवी , बुद्धजीवी , लघुजीवी , दीर्घजीवी आदि ।


(xi) ज्ञ – ( जाननेवाला ) – अज्ञ , निर्वज्ञ , सर्वज्ञ , विज्ञ , मर्मज्ञ आदि ।


(xii) त: – ( क्रिया विशेषण प्रत्यय ) – लघुतया , विशेषतया , मुख्यतया , सामान्यतया आदि ।


(xiii) तर – ( तुलना बोधक प्रत्यय ) – उच्चतर , अधिकतर , निम्नतर , सुन्द्रतर , श्रेष्ठतर आदि ।


(xiv) तम – ( सर्वधिकता बोधक प्रत्यय ) – उच्चतम , लघुतम , अधिकतम , महत्तम , निकृष्टतम आदि ।


(xv) ता – ( भाववाचक संज्ञा प्रत्यय ) – सुन्दरता , नवीनता , मधुरता , अधिकता आदि ।


(xvi) त्व – ( भाववाचक संज्ञा प्रत्यय ) – कृतित्व , ममत्व , महत्व , सतीत्व , जनित्व , आदि ।


(xvii) मान – ( विशेषण वाचक प्रत्यय ) – स्वाभिमान , मेहमान , निर्मान आदि ।


(xviii) वान – ( वाला ) – गुणवान , धनवान , बलवान , रूपवान आदि ।


2. तद्भव प्रत्यय :-

प्रत्यय = अर्थ = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) अंगड – ( वाला ) – बतंगड , कटंगड आदि ।


(ii) अंतू – ( वाला ) – रटंतू , घुमंतू , जीवंतू आदि ।


(iii) अत – ( संज्ञा प्रत्यय ) – खपत , लिखत , रंगत ,चढत , पढ्त आदि ।


(iv) आँध – ( संज्ञा प्रत्यय ) – विषांध , सरांध आदि ।


(v) आ – ( भाववाचक प्रत्यय ) – जोड़ा , फोड़ा , रगडा , झगड़ा , तगड़ा आदि ।


(vi) आई – ( भाववाचक प्रत्यय ) – कठिनाई , बुराई , सफाई , लिखाई , छपाई , जमाई आदि ।


(vii) आऊ – ( वाला ) – खाऊ , टिकाऊ , बिकाऊ , पण्डिताऊ , जडाऊ आदि ।


(viii) आप /आपा – ( भाववाचक प्रत्यय ) – मिलाप , अपनापा , पुजापा , बुढ़ापा आदि ।


(ix) आर – ( करनेवाला ) – कुम्हार , लुहार , चम्हार , त्यौहार आदि ।


(x) आरा – ( करनेवाला ) – घसियारा , हथियारा आदि ।


(xi) आरी – ( करनेवाला ) – पुजारी , भिखारी , जुआरी आदि ।


(xii) आलू – ( करनेवाला ) – कृपालु , झगड़ालू , दयालु आदि ।


(xiii) आवट – ( भाववाचक प्रत्यय ) – लिखावट , सजावट , बनावट , कसावट , बिनावट आदि ।


(xiv) आस – ( इच्छावाचक प्रत्यय ) – छपास , लिखास , निकास , प्यास , खास आसी ।


(xv) आहत – ( भाववाचक प्रत्यय ) – भलमनसाहत आदि ।


(xvi) आहट – ( भाववाचक प्रत्यय ) – गडगडाहट , घबराहट , चिल्लाहट आदि ।


(xvii) इन – ( स्त्री प्रत्यय ) – जुलाहिन , ठकुराइन , तेलिन , पुजारिन , सेठाइन आदि ।


(xviii) इया – ( वाला , लघुत्व , बोधक , स्त्री प्रत्यय ) – चुटिया , घटिया , चुहिया , डिबिया , भोजपुरिया , जयपुरिया , नागपुरिया , कनौजिया आदि ।


(xix) इला – ( वाला ) – चमकीला , भडकीला , पथरीला , शर्मिला , उर्मिला आदि ।


(xx) एरा – ( वाला ) – चचेरा , ममेरा , बहुतेरा , फुफेरा आदि ।


(xxi) औडा / औडी – ( लिंगवाचक प्रत्यय ) – सेवड़ा , रेवड़ी , पकौड़ा आदि ।


(xxii) त – ( भाववाचक प्रत्यय ) – चाहत , मिल्लत , मोहित , लिखित आदि ।


(xxiii) ता – ( कर्मवाचक प्रत्यय ) – आता , सोता , खाता , पिता , पीता , जगता , जाता आदि ।


(xxiv) पन – ( भाववाचक प्रत्यय ) – बचपन , पागलपन , बड़प्पन , लडकपन , छुटपन आदि ।


(xxv) वाला – ( कृतवाचक प्रत्यय , विशेषण प्रत्यय ) – अपनेवाला , ऊपरवाला , खानेवाला, जानेवाला , लालवाला , लिखनेवाला , छापनेवाला आदि ।


3. देशज प्रत्यय :-

प्रत्यय = अर्थ = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) अक्कड़ – ( वाला ) – घुमक्कड़ ,पियक्कड़ , भुलक्कड़ आदि ।


(ii) अड़ – ( स्वार्थिक ) – अंधड़ , भुक्खड़ आदि ।


(iii) आक – ( भाववाचक प्रत्यय ) – खर्राटा , फर्राटा , सर्राटा आदि ।


(iv) इयल – ( वाला ) – अडियल , दढ़ियल , सडियल आदि ।


4. विदेशज प्रत्यय :- विदेशज प्रत्यय को दो भागों में बाँटा जाता है ।


विदेशज के भाग :-

1. अरबी फारसी प्रत्यय

2. अंगेजी प्रत्यय


1. अरबी फारसी प्रत्यय :-

प्रत्यय = अर्थ = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) आ -( भाववाचक प्रत्यय ) – सफेदा , खराबा आदि ।


(ii) आना – ( भाववाचक , विशेषण वाचक प्रत्यय ) – जुर्माना , दस्ताना , मर्दाना ,मस्ताना , दस्ताना आदि ।


(iii) आनी – ( संबंधवाचक प्रत्यय ) – जिस्मानी , मर्दानी , बर्फानी , रूहानी आदि ।


(iv) कार – ( करनेवाला ) – काश्तकार , शिल्पकार , दस्तकार , पेशकार , सलाहकार आदि ।


(v) खोर – ( खाने वाला ) – गमखोर , घूसखोर , रिश्वतखोर , हरामखोर आदि ।


(vi) गार – ( करनेवाला ) – परहेजगार , मददगार , यादगार , रोजगार , बेरोजगार आदि ।


(vii) गी – ( भाववाचक संज्ञा प्रत्यय ) – जिन्दगी , गंदगी , बन्दगी आदि ।


(viii) चा – ( वाला ) – देगचा , बगीचा आदि ।


(ix) ची – ( वाला ) – बगीची , इलायची , डोलची , संदुकची आदि ।


(x) दान – ( स्थिति वाचक ) – इत्रदान , कलमदान , पीकदान आदि ।


(xi) दार – ( वाला ) – ईमानदार , कर्जदार दुकानदार , मालदार आदि ।


(xii) नाक – ( वाला ) – खतरनाक , खौफनाक , दर्दनाक ,शर्मनाक आदि ।


(xiii) बान – ( वाला ) – दरबान , बागबान , मेजबान आदि ।


(xiv) मंद – (वाला ) – अक्लमंद , जरुरतमन्द आदि ।


2. अंग्रेजी प्रत्यय :-


(i) इज्म – ( वाद , मत ) – कम्युनिज्म , बुद्धिज्म , सोशिलिज्म आदि ।


(ii) इस्ट – ( वादी , व्यक्ति ) – कम्युनिष्ट , बुद्धिस्ट , सोशलिष्ट आदि ।


हिंदी के वर्ग :-

1. कर्त्तृवाचक प्रत्यय

2. भाववाचक प्रत्यय

3. संबंध वाचक प्रत्यय

4. लघुतावाचक प्रत्यय

5. गणना वाचक प्रत्यय

6. सादृश्यवाचक प्रत्यय

7. गुणवाचक प्रत्यय

8. स्थान वाचक प्रत्यय


1. कर्त्तृवाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से कार्य करने वाले का पता चले उसे कर्त्तृवाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) सोना , लोहा , चम , कुम्ह + आर = सुनार , लोहार , चमार , कुम्हार आदि ।


(ii) चट ,खद , नद + ओरा = चटोरा , खदोरा , नदोरा आदि ।


(iii) दुःख , सुख , रस + इया = दुखिया , सुखिया , रसिया आदि ।


(iv) मर , सड , दढ़+ इयल = मरियल , सडियल , दढ़ियल आदि ।


(v) साँप , लुट , कस , लखे + एरा = सपेरा, लुटेरा, कसेरा, लखेरा आदि ।


(vi) घर , तांगा , झाड़ू , मोटर , रख , लिखना + वाला = घरवाला, ताँगेवाला, झाड़ूवाला, मोटरवाला , रखवाला , लिखनेवाला आदि ।


(vii) गा , रख , खी + वैया = गवैया, नचैया, रखवैया, खिवैया आदि ।


(viii) लकड़ी , पानी + हारा = लकड़हारा, पनिहारा आदि ।


(ix) राख , चाख + हार = राखनहार, चाखनहार आदि ।


(x) भूल , घूम , पिय + अक्कड़ = भुलक्कड़, घुमक्कड़, पियक्कड़ आदि ।


(xi) लड़ + आकू = लड़ाकू आदि ।


(xii) खेल + आड़ी = खिलाडी आदि ।


(xiii) भाग +ओडा = भगोड़ा आदि ।


2. भाववाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से भाव का पता चलता है उसे भाववाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) प्यास , सुख , रुख , लेख , भूख + आ = प्यासा , सूखा , रुखा , लेखा , भूखा आदि ।


(ii) मीठा , रंग , सिल , भला + आई = मिठाई, रंगाई, सिलाई, भलाई आदि ।


(iii) धम , धड , भड + आका = धमाका, धड़ाका, भड़ाका आदि ।


(iv) मोटा , बुढा , रंड + आपा = मुटापा, बुढ़ापा, रण्डापा आदि ।


(v) चिकना , कडवा , घबडा , गरमा , घबरा + आहट = चिकनाहट, कड़वाहट, घबड़ाहट, गरमाहट , घबराहट आदि ।


(vi) मीठा , खट , भड + आस = मिठास, खटास, भड़ास आदि ।


3. संबंध वाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से संबंध का पता चलता है उसे संबंध वाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) बहन , नन्द , रस + ओई = बहनोई, ननदोई, रसोई आदि ।


(ii) खेल , पह , अन + आड़ी = खिलाड़ी, पहाड़ी, अनाड़ी आदि ।


(iii) चाचा , मामा , मौसा , फूफा + एरा = चचेरा, ममेरा, मौसेरा, फुफेरा आदि ।


(iv) लोहा , सोना , मनी + आरी = लुहारी, सुनारी, मनिहारी आदि ।


(v) नानी , ससुर + आल = ननिहाल, ससुराल आदि ।


4. लघुता वाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से लघुता या न्यूनता का बोध होता है उसे लघुता वाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) रस्सा , कटोरा , टोकरा , ढोलक , लिखना + ई = रस्सी, कटोरी, टोकरी, ढोलकी , लिखाई आदि ।


(ii) टांग , टुक , पग , बछ + डी = टंगड़ी , टुकड़ी, पगड़ी, बछड़ी आदि ।


(iii) खाट , लोटा , चोटी , डीबी , पुड़ी + इया = खटिया, लुटिया, चुटिया, डिबिया, पुड़िया आदि ।


(iv) मुख , दुःख , चम + डा = मुखड़ा, दुखड़ा, चमड़ा आदि ।


(v) खाट , मध , साँप + ओला = खटोला, मझोला, सँपोला आदि ।


5. गणना वाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से गणना वाचक संख्या का पता चले उसे गणना वाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) चौ + था = चौथा आदि ।


(ii)दुस , तिस + रा = दूसरा , तीसरा आदि ।


(iii) पह + ला = पहला आदि ।


(iv) पाँच , दस , सात , आठ + वाँ = पाँचवाँ , दसवाँ , सातवाँ , आठवाँ आदि ।


6. सादृश्यवाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से शब्दों के बीच समानता का पता चले उसे सादृश्यवाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) मुझ , तुझ , नीला , चाँद , गुलाब , कमल + सा = मुझ–सा, तुझ–सा, नीला–सा, चाँद–सा, गुलाब–सा ,कमल सा आदि ।


(ii) दु , ति , चौ + हरा = दुहरा, तिहरा, चौहरा आदि ।


(iii) सुन , रूप + हला = सुनहला , रुपहला आदि ।


7. गुणवाचक प्रत्यय क्या होता है :– जिन प्रत्ययों को प्रयोग करने से गुण का पता चले उसे गुणवाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार है :-


(i) मीठ , ठंड , प्यास , भूख , प्यार + आ = मीठा, ठंडा, प्यासा, भूखा, प्यारा आदि ।


(ii) लच , गँठ , सज , रंग , चमक , रस + ईला = लचीला, गँठीला, सजीला, रंगीला, चमकीला, रसीला आदि ।


(iii) मटम , कष , विष + ऐला = मटमैला, कषैला, विषैला आदि ।


(iv) बट , पंडित , नामधार , खट + आऊ = बटाऊ, पंडिताऊ, नामधराऊ, खटाऊ आदि ।


(v) कला , कुल , दया + वन्त = कलावन्त, कुलवन्त, दयावन्त आदि ।


(vi) मूर्ख , लघु , कठोर , मृदु + ता = मूर्खता, लघुता, कठोरता, मृदुता आदि ।


8. स्थान वाचक प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के प्रयोग से किसी स्थान का पता चले उसे स्थान वाचक प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) पंजाब , गुजरात , मराठ , अजमेर , बीकानेर , बनारस , जयपुर + ई = पंजाबी, गुजराती, मराठी, अजमेरी, बीकानेरी, बनारसी, जयपुरी आदि ।


(ii) अमृतसर , भोजपुर , जयपुर , जमिलपुर + इया = अमृतसरिया, भोजपुरिया, जयपुरिया, जालिमपुरिया आदि ।


(iii) हरी , राजपूत , तेलंगा + आना = हरियाना, राजपूताना, तेलंगाना आदि ।


(iv) हरियाणा , देहल + वी = हरियाणवी, देहलवी आदि ।


हिंदी में प्रयुक्त होने वाले बहुत से उदहारण इस प्रकार हैं :-

1. अ – शैव, वैष्णव, तैल, पार्थिव, मानव, पाण्डव, वासुदेव, लूट, मार, तोल, लेख, पार्थ, दानव, यादव, भार्गव, माधव, जय, लाभ, विचार, चाल, लाघव, शाक्त, मेल, बौद्ध।


2. अक – चालक, पावक, पाठक, लेखक, पालक, विचारक, खटक, धावक, गायक, नायक, दायक।


3. अक्कड़ – भुलक्कड़, घुमक्कड़, पियक्कड़, कुदक्कड़, रुअक्कड़, फक्कड़, लक्कड़।


4. अंत – गढ़ंत, लड़ंत, भिड़ंत, रटंत, लिपटंत, कृदन्त, फलंत।


5. अन्तर – रुपान्तर, मतान्तर, मध्यान्तर, समानान्तर, देशांतर, भाषांतर।


6. अतीत – कालातीत, आशातीत, गुणातीत, स्मरणातीत।


7. अंदाज – तीरंदाज, गोलंदाज, बर्कंदाज, बेअंदाज।


8. अंध – सड़ांध, मदांध, धर्माँध, जन्मांध, दोषांध।


9. अधीन – कर्माधीन, स्वाधीन, पराधीन, देवाधीन, विचाराधीन, कृपाधीन, निर्णयाधीन, लेखकाधीन, प्रकाशकाधीन।


10. अन – लेखन, पठन, वादन, गायन, हवन, गमन, झाड़न, जूठन, ऐँठन, चुभन, मंथन, वंदन, मनन, चिँतन, ढ़क्कन, मरण, चलन, जीवन।


11. अना – भावना, कामना, प्रार्थना।


12. अनीय – तुलनीय, पठनीय, दर्शनीय।


13. अन्वित – क्रोधान्वित, दोषान्वित, लाभान्वित, भयान्वित, क्रियान्वित, गुणान्वित।


14. अन्वय – पदान्वय, खंडान्वय।


15. अयन – रामायण, नारायण, अन्वयन।


16. आ – प्यासा, लेखा, फेरा, जोड़ा, प्रिया, मेला, ठंडा, भूखा, छाता, छत्रा, हर्जा, खर्चा, पीड़ा, रक्षा, झगड़ा, सूखा, रुखा, अटका, भटका, मटका, भूला, बैठा, जागा, पढ़ा, भागा, नाचा, पूजा, मैला, प्यारा, घना, झूला, ठेला, घेरा, मीठा।


17. आइन – ठकुराइन, पंडिताइन, मुंशियाइन।


18. आई – लड़ाई, चढ़ाई, भिड़ाई, लिखाई, पिसाई, दिखाई, पंडिताई, भलाई, बुराई, अच्छाई, बुनाई, कढ़ाई, सिँचाई, पढ़ाई, उतराई।


19. आऊ – दिखाऊ, टिकाऊ, बटाऊ, पंडिताऊ, नामधराऊ, खटाऊ, चलाऊ, उपजाऊ, बिकाऊ, खाऊ, जलाऊ, कमाऊ, टरकाऊ, उठाऊ।


20. आक – लड़ाक, तैराक, चालाक, खटाक, सटाक, तड़ाक, चटाक।


21. आका – धमाका, धड़ाका, भड़ाका, लड़ाका, फटाका, चटाका, खटाका, तड़ाका, इलाका।


22. आकू – लड़ाकू, पढ़ाकू, उड़ाकू, चाकू।


23. आकुल – भयाकुल, व्याकुल।


24. आटा – सन्नाटा, खर्राटा, फर्राटा, घर्राटा, झपाटा, थर्राटा।


25. आड़ी – कबाड़ी, पहाड़ी, अनाड़ी, खिलाड़ी, अगाड़ी, पिछाड़ी।


26. आढ्य – धनाढ्य, गुणाढ्य।


27. आतुर – प्रेमातुर, रोगातुर, कामातुर, चिँतातुर, भयातुर।


28. आन – उड़ान, पठान, चढ़ान, नीचान, उठान, लदान, मिलान, थकान, मुस्कान।


29. आना – नजराना, हर्जाना, घराना, तेलंगाना, राजपूताना, मर्दाना, जुर्माना, मेहनताना, रोजाना, सालाना।


30. आनी – देवरानी, जेठानी, सेठानी, गुरुआनी, इंद्राणी, नौकरानी, रूहानी, मेहतरानी, पंडितानी।


31. आप – मिलाप, विलाप, जलाप, संताप।


32. आपा – बुढ़ापा, मुटापा, रण्डापा, बहिनापा, जलापा, पुजापा, अपनापा।


33. आब – गुलाब, शराब, शबाब, कबाब, नवाब, जवाब, जनाब, हिसाब, किताब।


34. आबाद – नाबाद, हैदराबाद, अहमदाबाद, इलाहाबाद, शाहजहाँनाबाद।


35. आमह – पितामह, मातामह।


36. आयत – त्रिगुणायत, पंचायत, बहुतायत, अपनायत, लोकायत, टीकायत, किफायत, रियायत।


37. आयन – दांड्यायन, कात्यायन, वात्स्यायन, सांस्कृत्यायन।


38. आर – कुम्हार, सुनार, लुहार, चमार, सुथार, कहार, गँवार, नश्वार।


39. आरा – बनजारा, निबटारा, छुटकारा, हत्यारा, घसियारा, भटियारा।


40. आरी – पुजारी, सुनारी, लुहारी, मनिहारी, कोठारी, बुहारी, भिखारी, जुआरी।


41. आरु – दुधारु, गँवारु, बाजारु।


42. आल – ससुराल, ननिहाल, घड़ियाल, कंगाल, बंगाल, टकसाल।


43. आला – शिवाला, पनाला, परनाला, दिवाला, उजाला, रसाला, मसाला।


44. आलु – ईर्ष्यालु, कृपालु, दयालु।


45. आलू – झगड़ालू, लजालू, रतालू, सियालू।


46. आव – घेराव, बहाव, लगाव, दुराव, छिपाव, सुझाव, जमाव, ठहराव, घुमाव, पड़ाव, बिलाव।


47. आवर – दिलावर, दस्तावर, बख्तावर, जोरावर, जिनावर।


48. आवट – लिखावट, थकावट, रुकावट, बनावट, तरावट, दिखावट, सजावट, घिसावट।


49. आवना – सुहावना, लुभावना, डरावना, भावना।


50. आवा – भुलावा, बुलावा, चढ़ावा, छलावा, पछतावा, दिखावा, बहकावा, पहनावा।


51. आहट – कड़वाहट, चिकनाहट, घबराहट, सरसराहट, गरमाहट, टकराहट, थरथराहट, जगमगाहट, चिरपिराहट, बिलबिलाहट, गुर्राहट, तड़फड़ाहट।


52. आस – खटास, मिठास, प्यास, बिँदास, भड़ास, रुआँस, निकास, हास, नीचास, पलास।


53. आसा – कुहासा, मुँहासा, पुंडासा, पासा, दिलासा।


54. आस्पद – घृणास्पद, विवादास्पद, संदेहास्पद, उपहासास्पद, हास्यास्पद।


55. ओई – बहनोई, ननदोई, रसोई, कन्दोई।


56. ओड़ा – भगोड़ा, हँसोड़ा, थोड़ा।


57. ओरा – चटोरा, कटोरा, खदोरा, नदोरा, ढिँढोरा।


58. ओला – खटोला, मँझोला, बतोला, बिचोला, फफोला, सँपोला, पिछोला।


59. औटा – बिलौटा, हिरनौटा, पहिलौटा, बिनौटा।


60. औता – फिरौता, समझौता, कठौता।


61. औती – चुनौती, बपौती, फिरौती, कटौती, कठौती, मनौती।


62. औना – घिनौना, खिलौना, बिछौना, सलौना, डिठौना।


63. औनी – घिनौनी, बिछौनी, सलौनी।


64. इंदा – परिँदा, चुनिँदा, शर्मिँदा, बाशिँदा, जिन्दा।


65. इ – दाशरथि, मारुति, राघवि, वारि, सारथि, वाल्मीकि।


66. इक – मानसिक, मार्मिक, पारिश्रमिक, व्यावहारिक, ऐतिहासिक, पार्श्विक, सामाजिक, पारिवारिक, औपचारिक, भौतिक, लौकिक, नैतिक, वैदिक, प्रायोगिक, वार्षिक, मासिक, दैनिक, धार्मिक, दैहिक, प्रासंगिक, नागरिक, दैविक, भौगोलिक।


67. इका – नायिका, पत्रिका, निहारिका, लतिका, बालिका, कलिका, लेखिका, सेविका, प्रेमिका।


68. इकी – वानिकी, मानविकी, यांत्रिकी, सांख्यिकी, भौतिकी, उद्यानिकी।


69. इत – लिखित, कथित, चिँतित, याचित, खंडित, पोषित, फलित, द्रवित, कलंकित, हर्षित, अंकित, शोभित, पीड़ित, कटंकित, रचित, चलित, तड़ित, उदित, गलित, ललित, वर्जित, पठित, बाधित, रहित, सहित।


70. इतर – आयोजनेतर, अध्ययनेतर, सचिवालयेतर।


71. इत्य – लालित्य, आदित्य, पांडित्य, साहित्य, नित्य।


72. इन – मालिन, कठिन, बाघिन, मालकिन, मलिन, अधीन, सुनारिन, चमारिन, पुजारिन, कहारिन।


73. इनी – भुजंगिनी, यक्षिणी, सरोजिनी, वाहिनी, हथिनी, मतवालिनी।


74. इम – अग्रिम, रक्तिम, पश्चिम, अंतिम, स्वर्णिम।


75. इमा – लालिमा, गरिमा, लघिमा, पूर्णिमा, हरितिमा, मधुरिमा, अणिमा, नीलिमा, महिमा।


76. इयत – इंसानियत, कैफियत, माहियत, हैवानित, खासियत, खैरियत।


77. इयल – मरियल, दढ़ियल, चुटियल, सड़ियल, अड़ियल।


78. इया – लठिया, बिटिया, चुटिया, डिबिया, खटिया, लुटिया, मुखिया, चुहिया, बंदरिया, कुतिया, दुखिया, सुखिया, आढ़तिया, रसोइया, रसिया, पटिया, चिड़िया, बुढ़िया, अमिया, गडरिया, मटकिया, लकुटिया, घटिया, रेशमिया, मजाकिया, सुरतिया।


79. इल – पंकिल, रोमिल, कुटिल, जटिल, धूमिल, तुंडिल, फेनिल, बोझिल, तमिल, कातिल।


80. इश – मालिश, फरमाइश, पैदाइश, पैमाइश, आजमाइश, परवरिश, कोशिश, रंजिश, साजिश, नालिश, कशिश, तफ्तिश, समझाइश।


81. इस्तान – कब्रिस्तान, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान, नखलिस्तान, कजाकिस्तान।


82. इष्णु – सहिष्णु, वर्घिष्णु, प्रभाविष्णु।


83. इष्ट – विशिष्ट, स्वादिष्ट, प्रविष्ट।


84. इष्ठ – घनिष्ठ, बलिष्ठ, गरिष्ठ, वरिष्ठ।


85. ई – गगरी, खुशी, दुःखी, भेदी, दोस्ती, चोरी, सर्दी, गर्मी, पार्वती, नरमी, टोकरी, झंडी, ढोलकी, लंगोटी, भारी, गुलाबी, हरी, सुखी, बिक्री, मंडली, द्रोपदी, वैदेही, बोली, हँसी, रेती, खेती, बुहारी, धमकी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी, जयपुरी, मद्रासी, पहाड़ी, देशी, सुन्दरी, ब्राह्मणी, गुणी, विद्यार्थी, क्रोधी, लालची, लोभी, पाखण्डी, विदुषी, विदेशी, अकेली, सखी, साखी, अलबेली, सरकारी, तन्दुरी, सिन्दुरी, किशोरी, हेराफेरी, कामचोरी।


86. ईचा – बगीचा, गलीचा, सईचा।


87. ईन – प्रवीण, शौकीन, प्राचीन, कुलीन, शालीन, नमकीन, रंगीन, ग्रामीण, नवीन, संगीन, बीन, तारपीन, गमगीन, दूरबीन, मशीन, जमीन।


88. ईना – कमीना, महीना, पश्मीना, नगीना, मतिहीना, मदीना, जरीना।


89. ईय – भारतीय, जातीय, मानवीय, राष्ट्रीय, स्थानीय, भवदीय, पठनीय, पाणिनीय, शास्त्रीय, वायवीय, पूजनीय, वंदनीय, करणीय, राजकीय, देशीय।


90. ईला – रसीला, जहरीला, पथरीला, कंकरीला, हठीला, रंगीला, गँठीला, शर्मीला, सुरीला, नुकीला, बर्फीला, भड़कीला, नशीला, लचीला, सजीला, फुर्तीला।


91. ईश – नदीश, कपीश, कवीश, गिरीश, महीश, हरीश, सतीश।


92. उ – सिँधु, लघु, भानु, गुरु, अनु, भिक्षु, शिशु, , वधु, तनु, पितु, बुद्धु, शत्रु, आयु।


93. उक – भावुक, कामुक, भिक्षुक, नाजुक।


94. उवा/उआ – मछुआ, कछुआ, बबुआ, मनुआ, कलुआ, गेरुआ।


95. उल – मातुल, पातुल।


96. ऊ – झाडू, बाजारू, घरू, झेँपू, पेटू, भोँपू, गँवारू, ढालू।


97. ऊटा – कलूटा।


98. ए – चले, पले, फले, ढले, गले, मिले, खड़े, पड़े, डरे, मरे, हँसे, फँसे, जले, किले, काले, ठहरे, पहरे, रोये, चने, पहने, गहने, मेरे, तेरे, तुम्हारे, हमारे, सितारे, उनके, उसके, जिसके, बकरे, कचरे, लुटेरे, सुहावने, डरावने, झूले, प्यारे, घने, सूखे, मैले, थैले, बेटे, लेटे, आए, गए, छोटे, बड़े, फेरे, दूसरे।


99. एड़ी – नशेड़ी, भँगेड़ी, गँजेड़ी।


100. एय – गांगेय, आग्नेय, आंजनेय, पाथेय, कौँतेय, वार्ष्णेय, मार्कँडेय, कार्तिकेय, राधेय।


101. एरा – लुटेरा, सपेरा, मौसेरा, चचेरा, ममेरा, फुफेरा, चितेरा, ठठेरा, कसेरा, लखेरा, भतेरा, कमेरा, बसेरा, सवेरा, अन्धेरा, बघेरा।


102. एल – फुलेल, नकेल, ढकेल, गाँवड़ेल।


103. एला – बघेला, अकेला, सौतेला, करेला, मेला, तबेला, ठेला, रेला।


104. एत – साकेत, संकेत, अचेत, सचेत, पठेत।


105. ऐत – लठैत, डकैत, लड़ैत, टिकैत, फिकैत।


106. ऐया – गवैया, बजैया, रचैया, खिवैया, रखैया, कन्हैया, लगैया।


107. ऐल – गुस्सैल, रखैल, खपरैल, मुँछैल, दँतैल, बिगड़ैल।


108. ऐला – विषैला, कसैला, वनैला, मटैला, थनैला, मटमैला।


109. क – बालक, सप्तक, दशक, अष्टक, अनुवादक, लिपिक, चालक, शतक, दीपक, पटक, झटक, लटक, खटक।


110. कर – दिनकर, दिवाकर, रुचिकर, हितकर, प्रभाकर, सुखकर, प्रलंयकर, भयंकर, पढ़कर, लिखकर, चलकर, सुनकर, पीकर, खाकर, उठकर, सोकर, धोकर, जाकर, आकर, रहकर, सहकर, गाकर, छानकर, समझकर, उलझकर, नाचकर, बजाकर, भूलकर, तड़पकर, सुनाकर, चलाकर, जलाकर, आनकर, गरजकर, लपककर, भरकर, डरकर।


111. करण – सरलीकरण, स्पष्टीकरण, गैसीकरण, द्रवीकरण, पंजीकरण, ध्रुवीकरण।


112. कल्प – कुमारकल्प, कविकल्प, भृतकल्प, विद्वतकल्प, कायाकल्प, संकल्प, विकल्प।


113. कार – साहित्यकार, पत्रकार, चित्रकार, संगीतकार, काश्तकार, शिल्पकार, ग्रंथकार, कलाकार, चर्मकार, स्वर्णकार, गीतकार, बलकार, बलात्कार, फनकार, फुँफकार, हुँकार, छायाकार, कहानीकार, अंधकार, सरकार।


114. का – गुटका, मटका, छिलका, टपका, छुटका, बड़का, कालका।


115. की – बड़की, छुटकी, मटकी, टपकी, अटकी, पटकी।


116. कीय – स्वकीय, परकीय, राजकीय, नाभिकीय, भौतिकीय, नारकीय, शासकीय।


117. कोट – नगरकोट, पठानकोट, राजकोट, धूलकोट, अंदरकोट।


118. कोटा – परकोटा।


119. खाना – दवाखाना, तोपखाना, कारखाना, दौलतखाना, कैदखाना, मयखाना, छापाखाना, डाकखाना, कटखाना।


120. खोर – मुफ्तखोर, आदमखोर, सूदखोर, जमाखोर, हरामखोर, चुगलखोर।


121. ग – उरग, विहग, तुरग, खड़ग।


122. गढ़ – जयगढ़, देवगढ़, रामगढ़, चित्तौड़गढ़, कुशलगढ़, कुम्भलगढ़, हनुमानगढ़, लक्ष्मणगढ़, डूँगरगढ़, राजगढ़, सुजानगढ़, किशनगढ़।


123. गर – जादूगर, नीलगर, कारीगर, बाजीगर, सौदागर, कामगर, शोरगर, उजागर।


124. गाँव – चिरगाँव, गोरेगाँव, गुड़गाँव, जलगाँव।


125. गा – तमगा, दुर्गा।


126. गार – कामगार, यादगार, रोजगार, मददगार, खिदमतगार।


127. गाह – ईदगाह, दरगाह, चरागाह, बंदरगाह, शिकारगाह।


128. गी – मर्दानगी, जिँदगी, सादगी, एकबारगी, बानगी, दीवानगी, ताजगी।


129. गीर – राहगीर, उठाईगीर, जहाँगीर।


130. गीरी – कुलीगीरी, मुँशीगीरी, दादागीरी।


131. गुना – दुगुना, तिगुना, चौगुना, पाँचगुना, सौगुना।


132. ग्रस्त – रोगग्रस्त, तनावग्रस्त, चिन्ताग्रस्त, विवादग्रस्त, व्याधिग्रस्त, भयग्रस्त।


133. घ्न – कृतघ्न, पापघ्न, मातृघ्न, वातघ्न।


134. चर – जलचर, नभचर, निशाचर, थलचर, उभयचर, गोचर, खेचर।


135. चा – देगचा, चमचा, खोमचा, पोमचा।


136. चित् – कदाचित्, किँचित्, कश्चित्, प्रायश्चित्।


137. ची – अफीमची, तोपची, बावरची, नकलची, खजांची, तबलची।


138. ज – अंबुज, पयोज, जलच, वारिज, नीरज, अग्रज, अनुज, पंकज, आत्मज, सरोज, उरोज, धीरज, मनोज।


139. जा – आत्मजा, गिरिजा, शैलजा, अर्कजा, भानजा, भतीजा, भूमिजा।


140. जात – नवजात, जलजात, जन्मजात।


141. जादा – शहजादा, रईसजादा, हरामजादा, नवाबजादा।


142. ज्ञ – विशेषज्ञ, नीतिज्ञ, मर्मज्ञ, सर्वज्ञ, धर्मज्ञ, शास्त्रज्ञ।


143. ठ – कर्मठ, जरठ, षष्ठ।


144. ड़ा – दुःखड़ा, मुखड़ा, पिछड़ा, टुकड़ा, बछड़ा, हिँजड़ा, कपड़ा, चमड़ा, लँगड़ा।


145. ड़ी – टुकड़ी, पगड़ी, बछड़ी, चमड़ी, दमड़ी, पंखुड़ी, अँतड़ी, टंगड़ी, लँगड़ी।


146. त – आगत, विगत, विश्रुत, रंगत, संगत, चाहत, कृत, मिल्लत, गत, हत, व्यक्त, बचत, खपत, लिखत, पढ़त, बढ़त, घटत, आकृष्ट, तुष्ट, संतुष्ट (सम्+तुष्+त)।


147. तन – अधुनातन, नूतन, पुरातन, सनातन।


148. तर – अधिकतर, कमतर, कठिनतर, गुरुतर, ज्यादातर, दृढ़तर, लघुतर, वृहत्तर, उच्चतर, कुटिलतर, दृढ़तर, निम्नतर, निकटतर, महत्तर।


149. तम – प्राचीनतम, नवीनतम, तीव्रतम, उच्चतम, श्रेष्ठतम, महत्तम, विशिष्टतम, अधिकतम, गुरुतम, दीर्घतम, निकटतम, न्यूनतम, लघुतम, वृहत्तम, सुंदरतम, उत्कृष्टतम।


150. ता – श्रोता, वक्ता, दाता, ज्ञाता, सुंदरता, मधुरता, मानवता, महत्ता, बंधुता, दासता, खाता, पीता, डूबता, खेलता, महानता, रमता, चलता, प्रभुता, लघुता, गुरुता, समता, कविता, मनुष्यता, कर्त्ता, नेता, भ्राता, पिता, विधाता, मूर्खता, विद्वता, कठोरता, मृदुता, वीरता, उदारता।


151. ति – गति, मति, पति, रति, शक्ति, भक्ति, कृति।


152. ती – ज्यादती, कृती, ढ़लती, कमती, चलती, पढ़ती, फिरती, खाती, पीती, धरती, भरती, जागती, भागती, सोती, धोती, सती।


153. तः – सामान्यतः, विशेषतः, मूलतः, अंशतः, अंततः, स्वतः, प्रातः, अतः।


154. त्र – एकत्र, सर्वत्र, अन्यत्र, नेत्र, पात्र, अस्त्र, शस्त्र, शास्त्र, चरित्र, क्षेत्र, पत्र, सत्र।


155. त्व – महत्त्व, लघुत्व, स्त्रीत्व, नेतृत्व, बंधुत्व, व्यक्तित्व, पुरुषत्व, सतीत्व, राजत्व, देवत्व, अपनत्व, नारीत्व, पत्नीत्व, स्वामित्व, निजत्व।


156. थ – चतुर्थ, पृष्ठ (पृष्+थ), षष्ठ (षष्+थ)।


157. था – सर्वथा, अन्यथा, चौथा, प्रथा, पृथा, वृथा, कथा, व्यथा।


158. थी – सारथी, परमार्थी, विद्यार्थी।


159. द – जलद, नीरद, अंबुद, पयोद, वारिद, दुःखद, सुखद, अंगद, मकरंद।


160. दा – सर्वदा, सदा, यदा, कदा, परदा, यशोदा, नर्मदा।


161. दान – पानदान, कद्रदान, रोशनदान, कलमदान, इत्रदान, पीकदान, खानदान, दीपदान, धूपदान, पायदान, कन्यादान, शीशदान, भूदान, गोदान, अन्नदान, वरदान, वाग्दान, अभयदान, क्षमादान, जीवनदान।


162. दानी – मच्छरदानी, चूहेदानी, नादानी, वरदानी, खानदानी।


163. दायक – आनन्ददायक, सुखदायक, कष्टदायक, पीड़ादायक, आरामदायक, फलदायक।


164. दायी – आनन्ददायी, सुखदायी, उत्तरदायी, कष्टदायी, फलदायी।


165. दार – मालदार, हिस्सेदार, दुकानदार, हवलदार, थानेदार, जमीँदार, फौजदार, कर्जदार, जोरदार, ईमानदार, लेनदार, देनदार, खरीददार, जालीदार, गोटेदार, लहरदार, धारदार, धारीदार, सरदार, पहरेदार, बूँटीदार, समझदार, हवादार, ठिकानेदार, ठेकेदार, परतदार, शानदार, फलीदार, नोकदार।


166. दारी – समझदारी, खरीददारी, ईमानदारी, ठेकेदारी, पहरेदारी, लेनदारी, देनदारी।


167. दी – वरदी, सरदी, दर्दी।


168. धर – चक्रधर, हलधर, गिरिधर, महीधर, विद्याधर, गंगाधर, फणधर, भूधर, शशिधर, विषधर, धरणीधर, मुरलीधर, जलधर, जालन्धर, शृंगधर, अधर, किधर, उधर, जिधर, नामधर।


169. धा – बहुधा, अभिधा, समिधा, विविधा, वसुधा, नवधा।


170. धि – पयोधि, वारिधि, जलधि, उदधि, संधि, विधि, निधि, अवधि।


171. न – नमन, गमन, बेलन, चलन, फटकन, झाड़न, धड़कन, लगन, मिलन, साजन, जलन, फिसलन, ऐँठन, उलझन, लटकन, फलन, राजन, मोहन, सौतन, भवन, रोहन, जीवन, प्रण, प्राण, प्रमाण, पुराण, ऋण, परिमाण, तृण, हरण, भरण, मरण।


172. नगर – गंगानगर, श्रीनगर, रामनगर, संजयनगर, जयनगर, चित्रनगर।


173. नवीस – फड़नवीस, खबरनवीस, नक्शानवीश, चिटनवीस, अर्जीनवीस।


174. नशीन – पर्दानशीन, गद्दीनशीन, तख्तनशीन, जाँनशीन।


175 .ना – नाचना, गाना, कूदना, टहलना, मारना, पढ़ना, माँगना, दौड़ना, भागना, तैरना, भावना, कामना, कमीना, महीना, नगीना, मिलना, चलना, खाना, पीना, हँसना, जाना, रोना, तृष्णा।


176. नाक – दर्दनाक, शर्मनाक, खतरनाक, खौफनाक।


177. नाम – अनाम, गुमनाम, सतनाम, सरनाम, हरिनाम, प्रणाम, परिणाम।


178. नामा – अकबरनामा, राजीनामा, मुख्तारनामा, सुलहनामा, हुमायूँनामा, अर्जीनामा, रोजनामा, पंचनामा, हलफनामा।


179. निष्ठ – कर्मनिष्ठ, योगनिष्ठ, कर्त्तव्यनिष्ठ, राजनिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ।


180. नी – मिलनी, सूँघनी, कतरनी, ओढ़नी, चलनी, लेखनी, मोरनी, चोरनी, चाँदनी, छलनी, धौँकनी, मथनी, कहानी, करनी, जीवनी, छँटनी, नटनी, चटनी, शेरनी, सिँहनी, कथनी, जननी, तरणी, तरुणी, भरणी, तरनी, मँगनी, सारणी।


181. नीय – आदरणीय, करणीय, शोचनीय, सहनीय, दर्शनीय, नमनीय।


182. नु – शान्तनु, अनु, तनु, भानु, समनु।


183. प – महीप, मधुप, जाप, समताप, मिलाप, आलाप।


184. पन – लड़कपन, पागलपन, छुटपन, बचपन, बाँझपन, भोलापन, बड़प्पन, पीलापन, अपनापन, गँवारपन, आलसीपन, अलसायापन, वीरप्पन, दीवानापन।


185. पाल – द्वारपाल, प्रतिपाल, महीपाल, गोपाल, राज्यपाल, राजपाल, नागपाल, वीरपाल, सत्यपाल, भोपाल, भूपाल, कृपाल, नृपाल।


186. पाली – आम्रपाली, भोपाली, रुपाली।


187. पुर – अन्तःपुर, सीतापुर, रामपुर, भरतपुर, धौलपुर, गोरखपुर, फिरोजपुर, फतेहपुर, जयपुर।


188. पुरा – जोधपुरा, हरिपुरा, श्यामपुरा, जालिमपुरा, नरसिँहपुरा।


189. पूर्वक – विधिपूर्वक, दृढ़तापूर्वक, निश्चयपूर्वक, सम्मानपूर्वक, श्रद्धापूर्वक, बलपूर्वक, प्रयासपूर्वक, ध्यानपूर्वक।


190. पोश – मेजपोश, नकाबपोश, सफेदपोश, पलंगपोश, जीनपोश, चिलमपोश।


191. प्रद – लाभप्रद, हानिप्रद, कष्टप्रद, संतोषप्रद, उत्साहप्रद, हास्यप्रद।


192. बंद – कमरबंद, बिस्तरबंद, बाजूबंद, हथियारबंद, कलमबंद, मोहरबंद, बख्तरबंद, नजरबंद।


193. बंदी – चकबंदी, घेराबंदी, हदबंदी, मेड़बंदी, नाकाबंदी।


194. बाज – नशेबाज, दगाबाज, चालबाज, धोखेबाज, पतंगबाज, खेलबाज।


195. बान – मेजबान, गिरहबान, दरबान, मेहरबान।


196. बीन – तमाशबीन, दूरबीन, खुर्दबीन।


197. भू – प्रभु (प्र+भू), स्वयंभू।


198. मंद – दौलतमंद, फायदेमंद, अक्लमंद, जरूरतमंद, गरजमंद, मतिमंद, भरोसेमंद।


199. म – हराम, जानम, कर्म (कृ+म), धर्म, मर्म, जन्म, मध्यम, सप्तम, छद्म, चर्म, रहम, वहम, प्रीतम, कलम, हरम, श्रम, परम।


200. मत् – श्रीमत्।


201. मत – जनमत, सलामत, रहमत, बहुमत, कयामत।


202. मती – श्रीमती, बुद्धिमती, ज्ञानमती, वीरमती, रूपमती।


203 मय – दयामय, जलमय, मनोमय, तेजोमय, विष्णुमय, अन्नमय, तन्मय, चिन्मय, वाङ्मय, अम्मय, भक्तिमय।


204. मात्र – नाममात्र, लेशमात्र, क्षणमात्र, पलमात्र, किँचित्मात्र।


205. मान – बुद्धिमान, मूर्तिमान, शक्तिमान, शोभायमान, चलायमान, गुंजायमान, हनुमान, श्रीमान, कीर्तिमान, सम्मान, सन्मान, मेहमान।


206. य – दृश्य, सादृश्य, लावण्य, वात्सल्य, सामान्य, दांपत्य, सानिध्य, तारुण्य, पाशचात्य, वैधव्य, नैवेद्य, धैर्य, गार्हस्थ्य, सौभाग्य, सौजन्य, औचित्य, कौमार्य, शौर्य, ऐश्वर्य, साम्य, प्राच्य, पार्थक्य, पाण्डित्य, सौन्दर्य, माधुर्य, स्तुत्य, वन्द्य, खाद्य, पूज्य, नृत्य।


207. या – शय्या, विद्य, चर्या, मृगया, समस्या, क्रिया, खोया, गया, आया, खाया, गाया, कमाया, जगाया, हँसाया, सताया, पढ़ाया, भगाया, हराया, खिलाया, पिलाया।


208. र – नम्र, शुभ्र, क्षुद्र, मधुर, नगर, मुखर, पाण्डुर, कुंजर, प्रखर, विधुर, भ्रमर, कसर, कमर, खँजर, कहार, बहार, सुनार।


209. रा – दूसरा, तीसरा, आसरा, कमरा, नवरात्रा, पिटारा, निबटारा, सहारा।


210. री – बाँसुरी, गठरी, छतरी, चकरी, चाकरी, तीसरी, दूसरी, भोजपुरी, नागरी, जोधपुरी, बीकानेरी, बकरी, वल्लरी।


211. रू – दारू, चारू, शुरू, घुंघरू, झूमरू, डमरू।


212. ल – मंजुल, शीतल, पीतल, ऊर्मिल, घायल, पायल, वत्सल, श्यामल, सजल, कमल, कायल, काजल, सवाल, कमाल।


213. ला – अगला, पिछला, मँझला, धुँधला, लाड़ला, श्यामला, कमला, पहला, नहला, दहला।


214. ली – सूतली, खुजली, ढपली, घंटाली, सूपली, टीकली, पहली, जाली, खाली, सवाली।


215. वंत – बलवंत, दयावंत, भगवंत, कुलवंत, जामवंत, कलावंत।


216. व – केशव, राजीव, विषुव, अर्णव, सजीव, रव, शव।


217. वत् – पुत्रवत्, विधिवत्, मातृवत्, पितृवत्, आत्मवत्, यथावत्।


218. वर – प्रियवर, स्थावर, ताकतवर, ईश्वर, नश्वर, जानवर, नामवर, हिम्मतवर, मान्यवर, वीरवर, स्वयंवर, नटवर, कमलेश्वर, परमेश्वर, महेश्वर।


219. वाँ – पाँचवाँ, सातवाँ, दसवाँ, पिटवाँ, चुनवाँ, ढलवाँ, कारवाँ, आठवाँ।


220. वा – बचवा, पुरवा, बछवा, मनवा।


221. वाई – बनवाई, सुनवाई, तुलवाई, लदवाई, पिछवाई, हलवाई, पुरवाई।


222. वाड़ा – रजवाड़ा, हटवाड़ा, जटवाड़ा, पखवाड़ा, बाँसवाड़ा, भीलवाड़ा, दंतेवाड़ा।


223. वाड़ी – फुलवाड़ी, बँसवाड़ी।


224. वान् – रूपवान्, भाग्यवान्, धनवान्, दयावान्, बलवान्।


225. वान – गुणवान, कोचवान, गाड़ीवान, प्रतिभावान, बागवान, धनवान, पहलवान।


226. वार – उम्मीदवार, माहवार, तारीखवार, रविवार, सोमवार, मंगलवार, कदवार, पतवार, वंदनवार।


227. वाल – कोतवाल, पल्लीवाल, पालीवाल, धारीवाल।


228. वाला – पानवाला, लिखनेवाला, दूधवाला, पढ़नेवाला, रखवाला, हिम्मतवाला, दिलवाला, फलवाला, रिक्शेवाला, ठेलेवाला, घरवाला, ताँगेवाला।


229. वाली – घरवाली, बाहरवाली, मतवाली, ताँगेवाली, नखरावाली, कोतवाली।


230. वास – रनिवास, वनवास।


231. वी – तेजस्वी, तपस्वी, मेधावी, मायावी, ओजस्वी, मनस्वी, जाह्नवी, लुधियानवी।


232. वैया – गवैया, खिवैया, रचैया, लगैया, बजैया।


233. व्य – तालव्य, मंतव्य, कर्तव्य, ज्ञातव्य, ध्यातव्य, श्रव्य, वक्तव्य, दृष्टव्य।


234. श – कर्कश, रोमश, लोमश, बंदिश।


235. शः – क्रमशः, कोटिशः, शतशः, अक्षरशः।


236. शाली – प्रतिभाशाली, गौरवशाली, शक्तिशाली, भाग्यशाली, बलशाली।


237. शील – धर्मशील, सहनशील, पुण्यशील, दानशील, विचारशील, कर्मशील।


238. शाही – लोकशाही, तानाशाही, इमामशाही, कुतुबशाही, नौकरशाही, बादशाही, झाड़शाही, अमरशाही, विजयशाही।


239. सा – मुझ-सा, तुझ-सा, नीला-सा, मीठा-सा, चिकीर्षा, पिपासा, जिज्ञासा, लालसा, चिकित्सा, मीमांसा, चाँद-सा, गुलाब-सा, प्यारा-सा, छोटा-सा, पीला-सा, आप-सा।


240. साज – जालसाज, जीनसाज, घड़ीसाज, जिल्दसाज।


241. सात् – आत्मसात्, भस्मसात्, जलसात्, अग्निसात्, भूमिसात्।


242. सार – मिलनसार, एकसार, शर्मसार, खाकसार।


243. स्थ – तटस्थ, मार्गस्थ, उदरस्थ, हृदयस्थ, कंठस्थ, मध्यस्थ, गृहस्थ, दूरस्थ, अन्तःस्थ।


244. हर – मनोहर, खंडहर, दुःखहर, विघ्नहर, नहर, पीहर, कष्टहर, नोहर, मुहर।


245. हरा – इकहरा, दुहरा, तिहरा, चौहरा, सुनहरा, रूपहरा, छरहरा।


246. हार – तारनहार, पालनहार, होनहार, सृजनहार, राखनहार, खेवनहार, खेलनहार, सेवनहार, नौसरहार, गलहार, कंठहार।


247. हारा – लकड़हारा, चूड़ीहारा, मनिहारा, पणिहारा, सर्वहारा, तारनहारा, मारनहारा, पालनहारा।


248. हीन – कर्महीन, बुद्धिहीन, कुलहीन, बलहीन, शक्तिहीन, मतिहीन, विद्याहीन, धनहीन, गुणहीन।


249. हुआ – चलता हुआ, सुनता हुआ, पढ़ता हुआ, करता हुआ, रोता हुआ, पीता हुआ, खाता हुआ, हँसता हुआ, भागता हुआ, दौड़ता हुआ, हाँफता हुआ, निकलता हुआ, गिरता हुआ, तैरता हुआ, सोचता हुआ, नाचता हुआ, गाता हुआ, बहता हुआ, बुझता हुआ, डूबता हुआ।


(ग) विदेशी प्रत्यय क्या होता है :- विदेशी प्रत्ययों को दो भागों में बाँटा गया है ।


विदेशी प्रत्यय के भाग :- उर्दू के कुछ प्रत्यय अरबी फारसी में भी प्रयोग किये जाते हैं ।


प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) आबाद = अहमदाबाद, इलाहाबाद , हैदराबाद आदि ।


(ii) खाना = दवाखाना, छापाखाना आदि ।


(iii) गर = जादूगर, बाजीगर, शोरगर , सौदागर , कारीगर आदि ।


(iv) ईचा = बगीचा, गलीचा आदि ।


(v) ची = खजानची, मशालची, तोपची , बाबरची , तबलची , अफीमची आदि ।


(vi) दार = मालदार, दूकानदार, जमीँदार , हिस्सेदार , थानेदार आदि ।


(vii) दान = कलमदान, पीकदान, पायदान आदि ।


(viii) वान = कोचवान, बागवान आदि ।


(ix) बाज = नशेबाज, दगाबाज , चालबाज आदि ।


(x) मंद = अक्लमन्द, भरोसेमन्द , जरुरतमन्द , ऐहसानमंद आदि ।


(xi) नाक = दर्दनाक, शर्मनाक आदि ।


(xii) गीर = राहगीर, जहाँगीर आदि ।


(xiii) गी = दीवानगी, ताजगी , सादगी आदि ।


(xiv) गार = यादगार, रोजगार , मददगार , गुनहगार आदि ।


(xv) इन्दा = परिन्दा, बाशिन्दा, शर्मिन्दा, चुनिन्दा आदि ।


(xvi) इश = फरमाइश, पैदाइश, रंजिश आदि ।


(xvii) इस्तान = कब्रिस्तान, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान आदि ।


(xviii) खोर = हरामखोर, घूसखोर, जमाखोर, रिश्वतखोर आदि ।


(xix) गाह = ईदगाह, बंदरगाह, दरगाह, आरामगाह आदि ।


(xx) गिरी = कुलीगीरी, मुंशीगीरी आदि ।


(xxi) नवीस = नक्शानवीस, अर्जीनवीस आदि ।


(xxii) नामा = अकबरनामा, सुलहनामा, इकरारनामा आदि ।


(xxiii) बंद = हथियारबन्द, नजरबन्द, मोहरबन्द आदि ।


(xxiv) साज = जिल्दसाज, घड़ीसाज, जालसाज आदि ।


जातिवाचक से भाववाचक संज्ञाएँ बनाने में प्रयुक्त प्रत्यय :- संस्कृत की तत्सम जातिवाचक संज्ञाओं के पीछे तद्धित प्रत्यय लगाकर उसे भाववाचक संज्ञाएँ बना दी जाती है ।


संज्ञा + तद्धित प्रत्यय = भाववाचक संज्ञा इस प्रकार हैं :-


(i) शत्रु , वीर + ता = शत्रुता ,वीरता आदि ।


(ii) गुरु , मनुष्य + त्व = गुरुत्व , मनुष्यत्व आदि ।


(iii) मुनि + अ = मौन आदि ।


(iv) पंडित + य = पांडित्य आदि ।


(v) रक्त + इमा = रक्तिमा आदि ।


व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक संज्ञाएँ बनाने में प्रयुक्त प्रत्यय :- जब किसी नाम के पीछे तद्धित प्रत्यय जोड़ते हैं तब जो संज्ञा बनती है उसे अपत्यवाचक संज्ञा कहते हैं ।


व्यक्ति वाचक संज्ञा + तद्धित प्रत्यय = अपत्यवाचक संज्ञा इस प्रकार हैं :-


(i) वसुदेव , मनु , कुरु , प्रथा , पांडू + अ = वासुदेव , मानव , कौरव , पार्थ , पाण्डव आदि ।


(ii) दिति + य = दैत्य आदि ।


(iii) बदर + आयन = बादरायण आदि ।


(iv) राधा , कुन्ती + एय = राधेय , कौन्तेय आदि ।


विशेषण से भाववाचक संज्ञाएँ बनाने में प्रयुक्त प्रत्यय :- विशेषण संज्ञा के पीछे संस्कृत के तद्धित प्रत्यय जोड़ने से जो संज्ञा बनती है उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं ।


विशेषण संज्ञा + तद्धित प्रत्यय = भाववाचक संज्ञा इस प्रकार हैं :-


(i) बुद्धिमान , मूर्ख , शिष्ट + ता = बुद्धिमता , मूर्खता , शिष्टता आदि ।


(ii) रक्त , शुक्ल + इमा = रक्तिमा , शुक्लिमा आदि ।


(iii) वीर , लघु + त्व = वीरत्व , लघुत्व आदि ।


(iv) गुरु , लघु + अ = गौरव , लाघव आदि ।


संज्ञा से विशेषण संज्ञाएँ बनाने में प्रयुक्त प्रत्यय :- संज्ञा के अंत में संस्कृत के गुण , भाव तथा तद्धित प्रत्यय को जोडकर विशेषण संज्ञा बनती हैं ।


संज्ञा + प्रत्यय = विशेषण संज्ञा इस प्रकार हैं :-


(i) निशा + अ = नैश आदि ।


(ii) तालु , ग्राम + य = तालव्य , ग्राम्य आदि ।


(iii) मुख , लोक + इक = मौखिक , लौकिक आदि ।


(iv) आनन्द , फल + इत = आनन्दित , फलित आदि ।


(v) बल + इष्ठ = बलिष्ठ आदि ।


(vi) निष्ठ + कर्म = कर्मनिष्ठ आदि ।


(vii) मुख , मधु + र = मुखर , मधुर आदि ।


(viii) रक्त + इम = रक्तिम आदि ।


(ix) कुल + ईन = कुलीन आदि ।


(x) मांस + ल = मांसल आदि ।


(xi) मेधा + वी = मेधावी आदि ।


(xii) तन्द्रा + इल = तन्द्रिल आदि ।


(xiii) तन्द्रा + लु = तंद्रालु आदि ।




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(क) संस्कृत के प्रत्यय क्या होते हैं :- संस्कृत व्याकरण में जो प्रत्यय शब्दों और मूल धातुओं से जोड़े जाते हैं वे संस्कृत के प्रत्यय कहलाते हैं ।


जैसे :- त – आगत , विगत , कृत ।


संस्कृत प्रत्यय के प्रकार :-


1. कृत प्रत्यय

2. तद्धित प्रत्यय


1. कृत प्रत्यय क्या होते हैं :- वे प्रत्यय जो क्रिया या धातु के अंत में लगकर एक नए शब्द बनाते हैं उन्हें कृत प्रत्यय कहा जाता है ।कृत प्रत्यय से मिलकर जो प्रत्यय बनते है उन्हें कृदंत प्रत्यय कहते हैं । ये प्रत्यय क्रिया और धातु को नया अर्थ देते हैं । कृत प्रत्यय के योग से संज्ञा और विशेषण भी बनाए जाते हैं ।


जैसे :- लिख +अक = लेखक


धातु + प्रत्यय = उदाहरण इस प्रकार हैं :-


(i) लेख, पाठ, कृ, गै , धाव , सहाय , पाल + अक = लेखक , पाठक , कारक , गायक , धावक , सहायक , पालक आदि ।


(ii) पाल् , सह , ने , चर , मोह , झाड़ , पठ , भक्ष + अन = पालन , सहन , नयन , चरण , मोहन , झाडन , पठन , भक्षण आदि ।


(iii) घट , तुल , वंद ,विद + ना = घटना , तुलना , वन्दना , वेदना आदि ।


(iv) मान , रम , दृश्, पूज्, श्रु + अनिय = माननीय, रमणीय, दर्शनीय, पूजनीय, श्रवणीय आदि ।


(v) सूख, भूल, जाग, पूज, इष्, भिक्ष् , लिख , भट , झूल +आ = सूखा, भूला, जागा, पूजा, इच्छा, भिक्षा , लिखा ,भटका, झूला आदि ।


(vi) लड़, सिल, पढ़, चढ़ , सुन + आई = लड़ाई, सिलाई, पढ़ाई, चढ़ाई , सुनाई आदि ।


(vii) उड़, मिल, दौड़ , थक, चढ़, पठ +आन = उड़ान, मिलान, दौड़ान , थकान, चढ़ान, पठान आदि ।


(viii) हर, गिर, दशरथ, माला + इ = हरि, गिरि, दाशरथि, माली आदि ।


(ix) छल, जड़, बढ़, घट + इया = छलिया, जड़िया, बढ़िया, घटिया आदि ।


(x) पठ, व्यथा, फल, पुष्प +इत = पठित, व्यथित, फलित, पुष्पित आदि ।


(xi) चर्, पो, खन् + इत्र = चरित्र, पवित्र, खनित्र आदि ।


(xii) अड़, मर, सड़ + इयल = अड़ियल, मरियल, सड़ियल आदि ।


(xiii) हँस, बोल, त्यज्, रेत , घुड , फ़ांस , भार + ई = हँसी, बोली, त्यागी, रेती , घुड़की, फाँसी , भारी आदि ।


(xiv) इच्छ्, भिक्ष् + उक = इच्छुक, भिक्षुक आदि ।


(xv) कृ, वच् + तव्य = कर्तव्य, वक्तव्य आदि ।


(xvi) आ, जा, बह, मर, गा + ता = आता, जाता, बहता, मरता, गाता आदि ।


(xvii) अ, प्री, शक्, भज + ति = अति, प्रीति, शक्ति, भक्ति आदि ।


(xviii) जा, खा + ते = जाते, खाते आदि ।


(xix) अन्य, सर्व, अस् + त्र = अन्यत्र, सर्वत्र, अस्त्र आदि ।


(xx) क्रंद, वंद, मंद, खिद्, बेल, ले , बंध, झाड़ + न = क्रंदन, वंदन, मंदन, खिन्न, बेलन, लेन , बंधन, झाड़न आदि ।


(xxi) पढ़, लिख, बेल, गा + ना = पढ़ना, लिखना, बेलना, गाना आदि ।


(xxii) दा, धा + म = दाम, धाम आदि ।


(xxiii) गद्, पद्, कृ, पंडित, पश्चात्, दंत्, ओष्ठ् , दा , पूज + य = गद्य, पद्य, कृत्य, पाण्डित्य, पाश्चात्य, दंत्य, ओष्ठ्य , देय , पूज्य आदि ।


(xxiv) मृग, विद् + या = मृगया, विद्या आदि ।


(xxv) गे +रु = गेरू आदि ।



(xxvi) देना, आना, पढ़ना , गाना + वाला = देनेवाला, आनेवाला, पढ़नेवाला , गानेवाला आदि ।


(xxvii) बच, डाँट , गा, खा ,चढ़, रख, लूट, खेव + ऐया \ वैया = बचैया, डटैया, गवैया, खवैया ,चढ़ैया, रखैया, लुटैया, खेवैया आदि ।


(xxviii) होना, रखना, खेवना + हार = होनहार, रखनहार, खेवनहार आदि ।


कृत प्रत्यय के भेद :-

1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय

2. विशेषणवाचक कृत प्रत्यय

3. भाववाचक कृत प्रत्यय

4. कर्मवाचक कृत प्रत्यय

5. करणवाचक कृत प्रत्यय

6. क्रियावाचक कृत प्रत्यय


1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिस शब्द से किसी के कार्य को करने वाले का पता चले उसे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


अक = लेखक , नायक , गायक , पाठक

अक्कड = भुलक्कड , घुमक्कड़ , पियक्कड़

आक = तैराक , लडाक

आलू = झगड़ालू

आकू = लड़ाकू , कृपालु , दयालु

आड़ी = खिलाडी , अगाड़ी , अनाड़ी

इअल = अडियल , मरियल , सडियल

एरा = लुटेरा , बसेरा

ऐया = गवैया , नचैया

ओडा = भगोड़ा

वाला = पढनेवाला , लिखनेवाला , रखवाला

हार = होनहार , राखनहार , पालनहार

ता = दाता , गाता , कर्ता , नेता , भ्राता , पिता , ज्ञाता ।

2. विशेषण वाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्यय के क्रियापदों से विशेषण शब्द की रचना होती है उसे विशेषण वाचक कृत प्रत्यय कहते है ।


जैसे :-


त = आगत ,विगत ,कृत

तव्य = कर्तव्य ,गन्तव्य

य = नृत्य ,पूज्य , खाघ

अनीय =पठनीय ,पूजनीय ,शोचनीय ।

3. भाववाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- भाववाचक कृत प्रत्यय वे होते हैं जो क्रिया से भाववाचक संज्ञा का निर्माण करते हैं ।


जैसे :-


अन = लेखन , पठन , गमन , मनन , मिलन

ति = गति , रति , मति

अ = जय , लेख , विचार , मार , लूट , तोल

आवा = भुलावा , छलावा , दिखावा , बुलावा , चढावा

आई = कमाई , चढाई , लड़ाई , सिलाई , कटाई , लिखाई

आहट = घबराहट , चिल्लाहट

औती = मनौती , फिरौती , चुनौती , कटौती

अंत = भिडंत , गढंत

आवट = सजावट , बनावट , रुकावट , मिलावट

ना = लिखना , पढना

आन = उड़ान , मिलान , उठान , चढ़ान

आव = चढ़ाव , घुमाव , कटाव

आवट = सजावट , लिखावट , मिलावट

4. कर्मवाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिस प्रत्यय से बनने वाले शब्दों से किसी कर्म का पता चले उसे कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


औना = बिछौना , खिलौना

ना = सूँघना , पढना , खाना

नी = सुँघनी , छलनी

गा = गाना ।

5. करणवाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :- जिस प्रत्यय की वजह से बने शब्द से क्रिया के करण का बोध होता है उसे करणवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


आ = भटका , भूला , झूला

ऊ = झाड़ू

ई = रेती , फांसी , भारी , धुलाई

न = बेलन , झाडन , बंधन

नी = धौंकनी , करतनी , सुमिरनी , छलनी , फूंकनी , चलनी

6. क्रिया वाचक कृत प्रत्यय क्या होता है :– जिस प्रत्यय के कारण बने शब्दों से क्रिया के होने का भाव पता चले उसे क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :-


ता = डूबता , बहता , चलता

या = खोया , बोया

आ = सुखा , भूला , बैठा

ना = दौड़ना , सोना

कर = जाकर , देखकर


कृत प्रत्यय के प्रकार :-

1. विकारी कृत प्रत्यय

2. अविकारी कृत प्रत्यय


1. विकारी कृत प्रत्यय क्या होता है :- विकारी कृत प्रत्यय में शुद्ध संज्ञा तथा विशेषण बने होते हैं इसलिए इसे विकारी कृत प्रत्यय कहते हैं ।


विकारी कृत प्रत्यय के भेद :-


1. क्रियार्थक संज्ञा

2. कृतवाचक संज्ञा

3. वर्तमान कालिक कृदंत

4. भूतकालिक कृदंत


यह भी पढ़ें : Paryayvachi Shabd , Samas In Hindi


1. क्रियार्थक संज्ञा क्या होती है :- वह संज्ञा जो क्रिया के मूल रूप में होती है और क्रिया का अर्थ देती है अथार्त को का अर्थ बताने वाला वह शब्द जो क्रिया के रूप में उपस्थित होते हुए भी संज्ञा का अर्थ देता है वह क्रियाथक संज्ञा कहलाती है ।


2. कृतवाचक संज्ञा क्या होती है :- वे प्रत्यय जिनके जुड़ने पर कार्य करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक संज्ञा कहते हैं ।


3. वर्तमान कालिक कृदंत क्या होती है :- जब हम एक काम को करते हुए दूसरे काम को साथ में करते हैं तो पहले वाली की गई क्रिया को वर्तमान कालिक कृदंत कहते हैं ।


4. भूतकालिक कृदंत क्या होता है :- जब सामान्य भूतकालिक क्रिया को हुआ , हुए , हुई आदि को जोड़ने से भूतकालिक कृदंत बनता है ।


2. अविकारी कृत प्रत्यय क्या होता है :- ऐसे कृत प्रत्यय जिनकी वजह से क्रियामूलक विशेषण और अव्यय बनते है उन्हें अविकारी कृत प्रत्यय कहते हैं ।


2. तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जब संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण के अंत में प्रत्यय लगते हैं उन शब्दों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं तद्धित प्रत्यय से मिलाकर जो शब्द बनते हैं उन्हें तद्धितांत प्रत्यय कहते हैं ।


जैसे :- सेठ+आनी = सेठानी ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) पछताना, जगना , पंडित , चतुर , ठाकुर + आइ = पछताई ,जगाई ,पण्डिताई ,चतुराई , ठकुराई आदि ।


(ii) पण्डित, ठाकुर + आइन = पण्डिताइन, ठकुराइन आदि ।


(iii) पण्डित, ठाकुर, लड़, चतुर, चौड़ा ,अच्छा + आई = पण्डिताई, ठकुराई, लड़ाई, चतुराई, चौड़ाई , अच्छाई आदि ।


(iv) सेठ, नौकर + आनी = सेठ, नौकर आदि ।


(v) बहुत, पंच, अपना +आयत = बहुतायत, पंचायत, अपनायत आदि ।


(vi) लोहा, सोना, दूध, गाँव + आर \आरा = लोहार, सुनार, दूधार, गँवार आदि ।


(vii) चिकना, घबरा, चिल्ल, कड़वा + आहट = चिकनाहट, घबराहट, चिल्लाहट, कड़वाहट आदि ।


(viii) फेन, कूट, तन्द्र, जटा, पंक, स्वप्न, धूम + इल = फेनिल, कुटिल, तन्द्रिल, जटिल, पंकिल, स्वप्निल, धूमिल आदि ।


(ix) कन्, वर्, गुरु, बल + इष्ठ = कनिष्ठ, वरिष्ठ, गरिष्ठ, बलिष्ठ आदि ।


(x) सुन्दर, बोल, पक्ष, खेत, ढोलक, तेल, देहात + ई = सुन्दर, बोल, पक्ष, खेत, ढोलक, तेल, देहात आदि ।


(xi) ग्राम, कुल + ईन = ग्रामीण, कुलीन आदि ।


(xii)भवत्, भारत, पाणिनी, राष्ट्र + ईय = भवदीय, भारतीय, पाणिनीय, राष्ट्रीय आदि ।


(xiii) बच्चा, लेखा, लड़का + ए = बच्चे, लेखे, लड़के आदि ।


(xiv) अतिथि, अत्रि, कुंती, पुरुष, राधा + एय = आतिथेय, आत्रेय, कौंतेय, पौरुषेय, राधेय आदि ।


(xv) फुल, नाक +एल = फुलेल, नकेल आदि ।


(xvi) डाका, लाठी + ऐत = डकैत, लठैत आदि ।


(xvii) अंध, साँप, बहुत, मामा, काँसा, लुट, सेवा + एरा/ऐरा = अँधेरा, सँपेरा, बहुतेरा, ममेरा, कसेरा, लुटेरा , सवेरा आदि ।


(xviii) खाट, पाट, साँप + ओला = खटोला, पटोला, सँपोला आदि ।



(xix) बाप, ठाकुर, मान + औती = बपौती, ठकरौती, मनौती आदि ।


(xx) बिल्ला, काजर + औटा = बिलौटा, कजरौटा आदि ।


(xxi) धम, चम, बैठ, बाल, दर्श, ढोल , लल + क = धमक, चमक, बैठक, बालक, दर्शक, ढोलक , ललक आदि ।


(xxii) विशेष, ख़ास + कर = विशेषकर, ख़ासकर आदि ।


(xxiii) खट, झट + का = खटका, झटका आदि ।


(xxiv) भ्राता, दो + जा = भतीजा, दूजा आदि ।


(xxv) चाम, बाछा, पंख, टाँग + डा/डी = चमड़ा, बछड़ा, पंखड़ी, टँगड़ी आदि ।


(xxvi) रंग, संग, खप + त = रंगत, संगत, खपत आदि ।


(xxvii) अद्य + तन = अद्यतन आदि ।


(xxviii) गुरु, श्रेष्ठ + तर = गुरुतर, श्रेष्ठतर आदि ।


(xxix) अंश, स्व , आ +त: = अंशतः, स्वतः , अत: आदि ।


(xxx) कम, बढ़, चढ़ + ती = कमती, बढ़ती, चढ़ती आदि ।


(xxxi) ऐ , कै , वै + सा = ऐसा , कैसा , वैसा आदि ।


(xxxii) लेश , रंच + मात्र = लेशमात्र , रंचमात्र आदि ।


तद्धित प्रत्यय के प्रकार :-

1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय

2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय

3. ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय

4. संबंध वाचक तद्धित प्रत्यय

5. अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय

6. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय

7. स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय

8. अव्ययवाचक तद्धित प्रत्यय

9. सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय

10. गणनावाचक तद्धति प्रत्यय

11. स्त्रीबोधक तद्धित प्रत्यय

12. तारतम्यवाचक तद्धित प्रत्यय

13. पूर्णतावाचक तद्धित प्रत्यय


1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्यय को जोड़ने से कार्य को करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं अथार्त जो प्रत्यय संज्ञा , सर्वनाम तथा विशेषण के साथ मिलकर करने वाले का या कर्तृवाचक शब्द को बनाते हैं उसे कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) सोना , लोहा , कह , चम + आर = सुनार , लुहार , कहार , चमार आदि ।


(ii) जुआ + आरी = जुआरी आदि ।


(iii) मजाक , रस , दुःख , आढत , मुख , रसोई + इया = मजाकिया , रसिया , दुखिया , आढतिया , मुखिया , रसोईया आदि ।


(iv) सब्जी , टोपी , घर , गाड़ी , पान + वाला = सब्जीवाला , टोपीवाला , घरवाला , गाड़ीवाला ,पानीवाला आदि ।


(v) पालन + हार = पालनहार आदि ।


(vi) समझ , ईमान , दुकान , कर्ज + दार = समझदार , ईमानदार , दुकानदार , कर्जदार आदि ।


(vii) तेल , भेद , रोग + ई = तेली , भेदी , रोगी आदि ।


(viii) घास , कसा , ठठ , लुट + एरा = घसेरा , कसेरा , ठठेरा , लुटेरा आदि ।


(ix) लकड , पानी , मनि + हारा = लकडहारा , पनिहारा , मनिहारा आदि ।


(x) पाठ , लेख , लिपि + क = पाठक , लेखक , लिपिक आदि ।


(xi) पत्र , कला , चित्र + कार = पत्रकार , कलाकार , चित्रकार आदि ।


(xii) मछु , गेरू , ठलु + आ = मछुआ , गेरुआ , ठलुआ आदि ।


(xiii) मशाल , खजान , मो + ची = मशालची , खजानची , मोची आदि ।


(xiv) कारी , बाजी , जादू + कारीगर , बाजीगर , जादूगर आदि ।


2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- इस प्रत्यय में भाव प्रकट होता है ।इसमें प्रत्यय लगने की वजह से कहीं कहीं पर आदि स्वर की वृद्धि हो जाया करती है । जो प्रत्यय संज्ञा तथा विशेषण के साथ जुडकर भाववाचक संज्ञा को बनाते हैं उसे भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) देवता ,मनुष्य , पशु , महा , गुरु , लघु + त्व = देवत्व , मनुष्यत्व , पशुत्व , महत्व , गुरुत्व , लघुत्व आदि ।


(ii) बच्चा , लडक , छुट , काला + पन = बचपन , लडकपन , छुटपन , कालापन आदि ।


(iii) सज्जा +वट = सजावट आदि ।


(iv) चिकना + हट = चिकनाहट आदि ।


(v) रंग + त = रंगत आदि ।


(vi) मीठा + आस = मिठास आदि ।


(vii) बुलाव , सराफ , चूर + आ = बुलावा , सराफा , चूरा आदि ।


(viii) भला , बुरा , कठिन , चतुर , ऊँचा + आई = भलाई , बुराई , कठिनाई , चतुराई , ऊँचाई आदि ।


(ix) बुढा , मोटा + आपा = बुढ़ापा , मोटापा आदि ।


(x) खट , मीठा , भडा + आस = खटास , मिठास , भडास आदि ।


(xi) कडवा , घबरा , झल्ला , चिकना + आहट = कडवाहट , घबराहट , झल्लाहट , चिकनाहट आदि ।


(xii) लाली , महा , अरुण , गरी + इमा = लालिमा , महिमा , अरुणिमा , गरिमा आदि ।


(xiii) गर्म , खेत , सर्द , गरीब + ई = गर्मी , खेती , सर्दी , गरीबी आदि ।


(xiv) सुंदर , मूर्ख , मनुष्य , लघु , गुरु , सम , कवि , एक , बन्धु + ता = सुन्दरता , मूर्खता , मनुष्यता , लघुता , गुरुता , समता , कविता , एकता , बन्धुता आदि ।


(xv) बाप , मान + औती =बपौती , मनौती आदि ।


(xvi) लाघ , गौर , पाट + अव = लाघव , गौरव , पाटव आदि ।


(xvii) पंडित , धैर , चतुर , मधु + य = पांडित्य , धैर्य , चातुर्य , माधुर्य आदि ।


(xviii) चौड़ा +आन = चौडान आदि ।


(xix) अपना + आयत = अपनायत आदि ।


(xx) छूट + आरा = छुटकारा आदि ।


3. ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्यय शब्दों से लघुता , प्रियता , हीनता का पता चलता हो उसे ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं ।


शब्द + प्रत्यय = उदहारण इस प्रकार हैं :-


(i) ढोल + क = ढोलक आदि ।


(ii) छाता + री = छतरी आदि ।


(iii) बूढी , लोटा , डिबा , खाट + इया = बुढिया , लुटिया , डिबिया , खटिया आदि ।


(iv) टोप , कोठर , टोकन , ढोलक , मण्डल , टोकरा , पहाड़ , घन + ई =टोपी , कोठरी , टोकनी , ढोलकी , मण्डली , टोकरी , पहाड़ी , घण्टी आदि ।


(v) छोटा , कन + की = छोटकी , कनकी आदि ।


(vi) चोरी , कालू + टा = चोट्टा , कलूटा आदि ।


(vii) दुःख , बछ + डा = दुखड़ा , बछड़ा आदि ।


(viii) पाग , टूक , टांग + डी = पगड़ी , टुकड़ी , टंगड़ी आदि ।


(ix) खाट + ली = खटोली आदि ।


(x) बच्चा + वा = बचवा आदि ।


(xi) लँगोट , कचौट , बहु + टी = लंगोटी , कछौटी , बहूटी आदि ।


(xii) खाट , साँप + ओला = खटोला , संपोला आदि ।


(xiii) ठाकुर +आ = ठकुरा आदि ।


(xiv) टीका + ली = टिकली आदि ।


(xv) मरा + सा = मरासा आदि ।


4. संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय क्या होता है :- जिन प्रत्ययों के लगने से संबंध का पता लगता है उसे संबंध वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं इसमें कभी कभी आदि स्वर