Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

रविवार, 29 मार्च 2020

BHOMIYA JI CHALISA श्री भोमिया चालीसा

श्री भोमिया चालीसा

श्री भोमिया चालीसा
शैल शिखर सम्मेत के, सांवलिया जिनराज
निशदिन मेरी वंदना, तारण-तरण जहाज दोहा
तीरथ रक्षक देव भोमिया। साथ निभावे देव भोमिया 1
इक कर शस्तर इक कर खप्पर। देव भोमिया सबको सुखकर 2
पुव्व देश के भैरूं कहाते। सुमिरत झटपट दौड़े आते 3
भटके राही पथ पा जाते। जो भैरूं का ध्यान लगाते 4
क्षां क्षीं क्षूं क्षौं नमः भोमिया। सरल सहज है देव भोमिया 5
लेते कुछ ना, सब कुछ देते। देख भगत मुस्काते हेते 6
हेत भरेली नजर सुहानी। बाबा तेरी अजब कहानी ॥7॥
भक्तों पर किरपा है पूरी। इच्छा कोई न रहे अधूरी 8
रिमझिम रिमझिम बरसे सावन। भक्त गृहों का महके आंगन ॥9॥
संकट मेटे कष्ट निवारे। बाबा है सच्चे रखवारे ॥10॥
जो मन से नित जाप करेगा। वैभव-कोष अखंड लहेगा 11
चमत्कार बाबा का भारी। ध्यान जाप करते नर-नारी 12

NAKODA BHAIRAV CHALISA नाकोड़ा भैरव चालीसा

NAKODA BHAIRAV CHALISA
नाकोड़ा भैरव चालीसा
-दोहा-
पार्श्वनाथ भगवान की, मूरत चित्त बसाय।
भैरव चालीसा पढूं, गाता मन हरसायटेर
-चौपाई-
नाकोड़ा भैरव सुखकारी। गुण गाती है दुनिया सारी1
भैरव की महिमा अति भारी। भैरव नाम जपे नर नारी2
जिनवर के हैं आज्ञाकारी। श्रद्धा रखते समकित धारी3
प्रातः उठ जो भैरूँ ध्याता। ऋद्धि-सिद्धि सब संपद् पाता4
भैरूं नाम जपे जो कोई। उस घर में नित मंगल होई5
नाकोड़ा लाखों नर आवे। श्रद्धा से परसाद चढ़ावे6
भैरव-भैरव आन पुकारे। भक्तों के सब कष्ट निवारे7
भैरव दर्शन शक्तिशाली। दर से कोई न जावे खाली8
जो नर नित उठ तुमको ध्यावे। भूत पास आने नहीं पावे9
डाकण छूमंतर हो जावे। दुष्ट देव आड़े नहीं आवे10
दिव्य मणि है मारवाड़ की। मारवाड़ की गोडवाड़ की11॥
कल्पतरू है परतिख भैरूँ । इच्छित देता सबको भैरूं 12
आधि-व्याधि सब दोष मिटावे। सुमिरत भैरूं शांति पावे13
बाहर परदेशे जावे नर। नाम मंत्र भैरूं का लेकर14
चौघड़िया दूषण मिट जावे। काल राहु सब नाठा जावे15
परदेशों में नाम कमावे। धन बोरा में भरकर लावे16
तन में साता मन में साता। जो भैरूँ को नित्य मनाता17
डूंगरवासी काला भैरव। सुखकारक है गोरा भैरव18
जो नर भक्ति से गुण गावे। दिव्य रतन सुख मंगल पावे19
श्रद्धा से जो शीष झुकावे। भैरूँ अमृत रस बरसावे20
मिलजुल सब नर फेरे माला। दौड्या आवे बादल काला21
मेघ झरे ज्यों झरते निर्झर। खुशहाली छावे धरती पर22
अन्न-संपदा भर-भर पावे। चारों ओर सुकाल बनावे23
भैरूँ है सच्चा रखवाला। दुश्मन मित्र बनाने वाला24
देश-देश में भैरूँ गाजे। खूट-खूट में डंका बाजे25
है नहीं अपना जिनके कोई। भैरूँ सहायक उनके होई26
नाभि केन्द्र से तुम्हें बुलावे। भैरूँ झट-पट दौड़े आवे27
भूखे नर की भूख मिटावे। प्यासे नर को नीर पिलावे28
इधर-उधर अब नहीं भटकना। भैरूँ के नित पाँव पकड़ना29
इच्छित संपद् आन मिलेगी। सुख की कलियां नित्य खिलेगी॥30
भैरूँ गण खरतर के देवा। सेवा से पाते नर मेवा31
कीर्तिरत्न की आज्ञा पाते। हुकम हाजिरी सदा बजाते32
ॐ ह्रीं भैरव बं बं भैरव। कष्ट निवारक भोला भैरव33
नैन मूंद धुन रात लगावे। सपने में वो दर्शन पावे34
प्रश्नों के उत्तर झट मिलते। रास्ते के कंटक सब मिटते35
नाकोड़ा भैरव नित ध्यावो। संकट मेटो मंगल पावो36
भैरूँ जपन्ता मालं माला। बुझ जाती दुःखों की ज्वाला37
नित उठ जो चालीसा गावे। धन सुत से घर स्वर्ग बनावे38
भैरू चालीसा पढ़े, मन में श्रद्धा धार।
कष्ट कटे महिमा बढ़े, संपद होत अपार39
"जिनकान्ति" गुरुराज के शिष्य "मणिप्रभ" राय।
भैरव के सानिध्य में, ये चालीसा गाय40
PARSHWANATH NAKODA BHAIRAV CHALISA, NAKODA BHAIRAV CHALISA, JAIN NAKODA BHAIRAV PATH, NAKODA BHAIRAV STOTRA, NAKODA BHAIRAV STOTRA, NAKODA BHAIRAVW CHALISA, NAKODA BHAIRAV 40

DADA GURU EKTISA दादागुरु इकतीसा

दादागुरु इकतीसा

दादागुरु इकतीसा
-दोहा-
श्री गुरुदेव दयाल को, मन में ध्यान लगाय।
अष्ट सिद्धि नव निधि मिले, मन वांछित फल पाय॥
-चौपाई-
श्री गुरु चरण शरण में आयो, देख दरश मन अति सुख पायो,
दत्त नाम दुःख भंजन हारा, बिजली पात्र तले धरनारा1
उपशम रस का कन्द कहावे, जो सुमरे फल निश्चय पावे।
दत्त सम्पत्ति दातार दयालु, निज भक्तन के हैं प्रतिपालु॥2
बावन वीर किये वश भारी, तुम साहिब जग में जयकारी।
जोगणी चौसठ वशकर लीनी, विद्या पोथी प्रकट कीनी3
पांच पीर साधे बलकारी, पंच नदी पंजाब मझारी।
अंधों की आँखें तुम खोली, गुंगों को दे दीनी बोली4
गुरु वल्लभ के पाट विराजो, सूरिन में सूरज सम साजो।
जग में नाम तुम्हारो कहिये, परतिख सुरतरु सम सुख लहिये5
इष्ट देव मेरे गुरु देवा, गुणीजन मुनि जन करते सेवा।
तुम सम और देव नहीं कोई, जो मेरे हितकारक होई6
तुम हो सुर तरु वाँछित दाता, मैं निशदिन तुमरे गुण गाता।
पार-ब्रह्म गुरु हो परमेश्वर, अलख निरंजन तुम जगदीश्वर7
तुम गुरु नाम सदा सुख दाता, जपत पाप कोटि कट जाता।
कृपा तुम्हारी जिन पर होई, दु:ख कष्ट नहीं पावे सोई8
अभयदान दाता सुखकारी, परमातम पूरण ब्रह्मचारी।
महाशक्ति बल बुद्धि-विधाता, मैं नित उठ गुरु तुम्हें मनाता9
तुम्हारी महिमा है अतिभारी, टूटी नाव नयी कर डारी।
देश-देश में थम्भ तुम्हारा, संघ सकल के हो रखवाला10

PARSHWANATH CHALISA श्री पार्श्वनाथ चालीसा (108 नाम गर्भित)



-दोहा-
पार्श्वनाथ प्रणमो सदा, मन में श्रद्धा धार।
मंगलमाल लहो सदा, करो सपन साकार
चालीसा प्रभु पार्श्व का, इक मन से हो जाप।
ऋद्धि-वृद्धि-संपद् लहे, मिटे सकल संताप
चौपाई
तीर्थंकर प्रभु पारस प्यारे। वामानंदन जगत दुलारे1
अश्वसेन आंगन हुलराया। सुर सुरपति ने ठाट रचाया2
पारसमणि है प्रभुवर पारस। गूंजे चिहुं दिशि पारस-पारस3
जय प्रभु पारस जय प्रभु पारस। जय पद्मावती पूजित पारस4
पारस तेरा मुझे सहारा। हाथ पकड़ मैं लहूँ किनारा5
तेरे दर पर जो आता है। झोली अपनी भर जाता है6
कल्पवृक्ष चिंतामणि प्रभुवर। वांछित दाता पार्श्व जिनेश्वर7
तुम हो गौड़ी तुम शंखेश्वर। नवखण्डा भाभा नागेश्वर8
पार्श्व अवन्ति मक्षी स्तंभन। नाकोडा लौद्रव भयभंजन
पारसमणि दोकड़िया चंदा। जीरावला नव सप्त फणिन्दा10

GURU GOUTAM SWAMI EKTISA, श्री गौतम इकतीसा

GURU GOUTAM SWAMI EKTISA, 

श्री गौतम इकतीसा
-दोहा-
गुरु गौतम स्वामी नमो, जपो सदा दिन रात।
गुरु गौतम के नाम से, निशि में होय प्रभात
चौपाई
गुरुवर गौतम लब्धि निधाना। सुमिरत पावत संपत्ति नाना1
वीर प्रभु के शिष्य उदारी। सकल संघ के हैं उपकारी2
चमत्कार संयुत गुरुनामा। जाप जपो नित आठों यामा3
मेरे मन में गौतमस्वामी। रोम रोम में गौतमस्वामी4
नित उठ वंदूं गौतमस्वामी। जय हो जय हो गौतमस्वामी5
श्रमण शिरोमणि गौतमस्वामी। ऊँ ह्रीँ  अहम् गौतमस्वामी6
गौतम नाम अनंत विभूषित। ध्यान धरो निज आतम के हित7
जाप जपत दुःख दिन फिर जावे। दुःख में सुख की बदली आवे8
वीर प्रभु के पहले गणधर। परम लाडले पहले मुनिवर9
गुव्वर की माटी का हीरा। उसे तराशे श्री महावीरा10

MUNISUVRAT SWAMI EKTISA श्री मुनिसुव्रतस्वामी इकतीसा


श्री मुनिसुव्रतस्वामी इकतीसा
-दोहा-
जय-जय मुनिसुव्रत प्रभो, पावन तेरा नाम।
सुमिरन मन से जो करे, वो पावे शिवधाम
मुनिसुव्रत के पाठ से, संकट सब टल जाय।
सुख संपद् के कोष से, घर आंगन भर जाय
मुनिसुव्रत प्रभुवर जयकारी। जाप जपो नित मंगलकारी 1।
जिन पूजा से जिन हो जावे। पूजा पारसमणि कहलावे 2
मुनिसुव्रत प्रभु परगट ज्योति। ज्यों आभूषण चमके मोती 3
अखिल विश्व तेरे गुण गाता। अपना जीवन सरस बनाता 4
मुख से बरसे अमरित धारा। झेले वो नर हो भवपारा 5
जीवन में जो शांति चाहो। तो मुनिसुव्रत प्रभु को ध्यावो 6
कृष्ण वर्ण जिन प्रतिमा सोहे। मुख मुस्कान सदा मन मोहे ॥7॥
सुनि मन महिमा आनंद पावे। मुनिसुव्रत पक्षाल लगावे 8
अमल नीर गंगोदक लावो। मुनिसुव्रत पक्षाल करावो ॥9॥

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

नवपद - आराधना, श्रीपाल-मयणा सुंदरी , कर्म सिद्धान्त कथा, Navpad mahima, shripal katha

जैन जगत में नवपद की महिमा अपरंपार है 
जिनशास्त्रों के अनुसार करीबन इग्यारह लाख वर्ष पूर्व, अनंत उपकारी प्रभु मुनिसुव्रत स्वामीजी के समय में यह तप-उपासना की गई थी

जिनशासन की परम् उपासक, जिनभाषित कर्म के सिद्धांत पर अटूट् श्रधा रखने वाली सुश्राविका मयणासुंदरी ने अपने सुश्रावक पतिदेव महाराजा श्रीपाल के कोढ़ रोग निवारण हेतु... उज्जैन नगरी में सिद्धचक्रजी की आराधना करके उस भयंकर रोग से मुक्ति दिलायी थी l

  इस तप की महिमा का उल्लेख करीबन् 2600 वर्ष पहले वर्तमान जिनशासक देव श्रीमहावीरस्वामीजी ने... अनंतलब्धिनिधाय गौतमस्वामीजी और श्रेणिक महाराजा को अपनी देशना में कही थी l.

उज्जैन नगर में महाप्रतापी प्रजापाल नामक राजा राज्य कर रहे थे, उनके दोनो रानियों से एक एक पुत्री थी, पहली रानी सोभाग्यसुंदरी की पुत्री का नाम सुरसुन्दरी जो स्वभाव् से मिथ्यात्व को मानने वाली थी, दुसरी रूपसुंदरी की पुत्री का नाम मयणासुंदरी.जो सम्यक्त्व को धारण किये हुए थीl

मयणा के पिता - एक दिन राज्यसभा में अपनी पुत्रियों की बुद्धिमता की परीक्षा लेते हुए कर्म के सवाल पर राजा ने पुछा ,क्या पिता के कर्म से प्राप्त एश्वर्य से आपको सभी खुशियाँ मिल सकती है..?

प्रश्नोत्तर में सुरसुंदरी ने कहा... मुझे मेरे महान् राजा पिता की कृपा से सब कुछ मिल जायगा l

प्रश्नोंत्तर में मयणासुंदरी ने कहा... सभी जीवात्मा अपने पूर्व एवं वर्तमान कर्म के अनुसार ही सुख-दुःख प्राप्त करते है, उसमे न कोई कम कर सकता है न ही बढ़ा सकता है l

मयणा के पिता - यह सुनकर अभिमान से चूर राजा अति क्रोधित होते हुए कहा... मयणा.. तुझे ये हीरे से जड़े रेशमी वस्त्र, स्वादिस्ट भोजन, रत्न के झुले, दास-दासियाँ सभी कुछ मेरी मेहरबानी की वजह से मिल रहे है l

मयणा.. पिताश्री आप क्रोधित न होवें, मैंने मेरे पुर्वजन्म के कृत कर्मों के कारण ही आपके यहाँ जन्म लिया है

 पूर्व भवोंभव में किये पुण्यमयी कार्य, जिनवाणी पर अटूट श्रद्धा, राजा, रंक या त्रियंच जो भी जीवन मिला... उसे न्यायोच्चित्त जिनवाणी के अनुसार जीने वालो को अवश्य ही उपकारी प्रभु का मार्गदर्शन मिलता है l

 श्रीपालकुमार राजा के घर जन्म लेकर भी कोढ़ रोग से ग्रस्त क्यों...?

श्रीपाल राजा पुर्व भव में हीरण्यपुर नगर के श्रीकांत राजा थे, जिन्हें शिकार का व्यसन था ! उनकी रानी श्रेष्ठ गुणवाली श्रीमती... जिनकी जैनधर्म पर अटूट श्रद्धा थी, वह हमेशा राजा को एकांत में समझाया करती थी...प्राणेश ! किसी भी जीव की हिंसा से जन्मोंजन्म तक भयंकर परिणाम भुगतने पड़ते है, इस घर्णास्पद कृत्य से मैं और पृथ्वी दोनों लज्जित हो रहे है, आदि ! लेकिन गलत मार्ग के व्यसनी इतनी जल्दी कहाँ समझने वाले थे?

एक दिन सात सौ लोगो की टोली के साथ राजा श्रीकांत शिकार के लिए भयंकर जंगल में गये, वहाँ काउसग्ग ध्यान में खड़े एक मुनिराज को देखकर सभी व्यंग के साथ कहने लगे,यह तो किसी रोग से ग्रसित कोढ़िया है, इसे मारो मारो ! राजा के मुख से निकलते ही सभी ने मिलकर मुनिराज को मारते मारते लोहलुहान कर दिया l इस दृष्य को देख राजा श्रीकांत आनंदरस में डूब गये l

मुनिवर ने तो समता भाव में लीन होकर आत्मकल्याण किया, उधर धर्मानुरागी श्रीमती के बारबार अनंत बार समझाते रहने से अंतत: श्रीकांत को पूर्व पुण्य के उदय से अपने कुकृत कार्यो का एहसास हुआ, और अपने महापाप का प्रायश्चित करते करते संयम-दीक्षा धारण की l

जिनशासन के नव पदों की आराधना करते हुए श्रीकांत के जीव ने मृत्यु के उपरांत श्रीपाल राजा के भव में जन्म लिया, पूर्वो पूर्व पुण्य एवं कठोर पश्याताप से राजा के यहाँ उम्बर नाम से जन्म मिला, मगर जन्म के साथ ही कोढ़ रोग से ग्रसित थे l

राजा श्रीकांत के पूर्व भव के सात सौ सैनिक भी कोढ़ रोग से ग्रसित होकर मानव जन्म में आये, जब श्रीपाल कुमार बड़े हुए, तब संयोग से एक दिन वह कोढियों की टोली घुमती फिरती उस गाँव में आयी और श्रीपालकुमार को अपने साथ ले जाकर टोली का प्रमुख (उम्बरराणा नाम से) बना लिया l

उधर प्रजापाल राजा ने पुत्री सुरसुन्दरी ( पिता-कर्मी ) को इच्छित वरदान दिया, एवं शंखपुरी के अधिपति रूप के राजा अरिदमन के साथ उसका विवाह राजशाही ठाठ-बाट से किया, दहेज में अनन्य धन-दौलत दास-दासियाँ दी l

घमंडी पिता प्रजापाल ने मयणा को धिक्कारते हुए कहाँ... तूने मेरा अपमान किया है, तू वास्तव में मुर्ख शिरोमणि है, इस राजसभा के समक्ष मेरे मान-सम्मान को भयंकर ठेस पहुंचायी है, इसका दंड तुझे अवश्य मिलेगा l

अगले दिन प्रजापाल शिकार पर निकले, वहाँ एक झुंड को आते देखा, पता लगाने पर मालुम हुआ.. यह सातसौ कोढियों का झुंड है l

राजा का विरोधी मन अहंकार से ज्वलित हो उठा और पुत्री मयणा का विवाह कोढियों के राजा उम्बरराणा के साथ करने का निश्चय कर लिया ! सोचने लगे.. मयणा कर्म-कर्म करती है, वह कर्म का प्रत्यक्ष फल प्राप्त करें, वे कटुवचन मेरे मन मष्तिस्क में अभी भी खटक रहे है l

उम्बरराणा की बरात राजमहल की और बढ़ रही है, राणा खच्चर पर सवार है, कोतहुल का माहोल है... सभी रोग से क्षीण है, कोई लुला-लंगड़ा है, कईओं के शरीर पर घाव है, खून टपक रहा है, मक्खियाँ भिनभीना रही है, उनको देखकर लग रहा था.. नरक से भी बदत्तर जिन्दगी जी रहे है l

राजसभा में प्रजापाल ने आदेश स्वरूप कहा... मयणा ! तेरे कर्मो द्वारा प्रदान यह तेरा पति आया है, इसके साथ शादी कर सभी प्रकार के सुखों को तू भोग l

कर्म आधारित भाग्य पर भरोसा करने वाली मयणासुंदरी ने क्षणभर भी विलंब किये बिना दर्द से कहराते हुए कोढ़ीये के गले में वरमाला अर्पित कर उसे पति के रूप में स्वीकार कर लिया । उम्बरराणा लडखडाती आवाज में मयणा से कहते है ,खुब गहराई से सोच ले, कंचनवर्णी तेरी काया मेरे संग से नष्ट हो जायगी, तुम देवांगना जैसी मुझे पति मानना  उचित नही है l

ऐसे वचन सुनकर मयणा को अपार दुःख हुआ, आँखों से टपटप आँसू टपकने लगे, पति के चरणों में गिरकर बोली , हे प्राणेश्वर..! आप यह क्या बोल रहे है, जैसे सूर्य पश्चिम दिशा में नही उगता, ठीक वैसे ही सती स्त्रियाँ अपने पतिधर्म से कभी नही डगमगाती l

 पूर्व भवोंभव में किये पुण्यमयी कार्य, जिनवाणी पर अटूट श्रद्धा, राजा, रंक या त्रियंच जो भी जीवन मिला हैं उसे न्यायोच्चित्त जिनवाणी के अनुसार जीने वालो को अवश्य ही उपकारी प्रभु का मार्गदर्शन मिलता है l याद रहे हमारा वर्तमान भी अगले जन्मों का पूर्व भव होगा - तुरन्त जागों ओर आगे बढ़ों l

मयणासुन्दरी - प्रातः काल होने पर मयणा ने अपने पति से कहा, हे प्राणनाथ चलो अपने भगवान आदिनाथ के मंदिर जाकर युगादिदेव के दर्शन करें, ऋषभदेव प्रभु के दर्शन करने से दुःख एवं क्लेश का नाश होता है, एकाग्रचित भक्ति भाव से दोनो ने प्रभु दर्शन, चैत्यवंदन, कार्योत्सर्ग आदि करके मयणा प्रभु से प्रार्थना करने लगी , हे प्रभु ! आप जगत में चिंतामणी रत्न के समान है, मोक्ष प्रदान करने वाले है ! शरण में आये इस सेवक के भी आप ही आधार है, हमारे दुःख - दुर्भाग्य को दूर कीजिये l

जिनेश्वर का वंदन-पूजन करके मयणा ने पतिदेव से कहा , प्राणनाथ, पास में ही पोषधशाला में गुरुभगवंत विराजमान है, एवं वे देशना दे रहे है.. हम भी धर्म देशना का श्रवण करें ! देशना के उपरांत मयणा ने गुरुदेव को विनंती करते हुए कहा, गुरुदेव ! आगम शास्त्रों में देखकर ऐसा कोई उपाय बताइये कि आपके इस श्रावक के देह का कोढ़ रोग नष्ट हो जाय ।

  तब आचार्य भगवंत बोले : यंत्र-तंत्र-जड़ी-बुटी-मणिमंत्र-ओषधि आदि उपचार बताना जैन साधुओं का आचार नही है, गुरुदेव ने आगम को देखकर मयणा को कहा.. श्री सिद्धचक्रजी के पट्ट की स्थापना कर नवपद की आराधना-ध्यान-पूजन करें ! यह तप आसोज शुक्ला सप्तमी को आरंभ कर नौ आयम्बिल करें, इसी तरह चैत्र शुक्ला सप्तमी से भी ।
 कुल साढ़े चार वर्ष तक अर्थात 9 ओलीजी की आराधना कपट-माया-दम्भ रहित शुद्ध भक्तिभाव से करें l

नवपद आराधना :  इस तप की विशुद्ध आराधना से रोग-दुःख-दुर्भाग्य सभी शांत हो जाते है ! पूजन के पश्चात्त पक्षाल को लगाने से अठारह प्रकार के कोढ़ रोगो का नाश होता है, गुमड़े एवं घाव भी अच्छे हो जाते है, विविध प्रकार की पीड़ा, वेदना सभी दुर हो जाते है । मन-वचन-काया को संयम में रखकर, शुद्ध उच्चारण से, नवपद को समर्पित भाव से धर्मध्यान-आराधना करें, उसकी सभी प्रकार की वेदनाएं दूर होकर इस भव और परभव में भी मनवांछित सिद्धियाँ हासिल होगी l

जिनगुरु मुनिचन्द्रसुरिश्वरजी ने मयणा को श्री सिद्धचक्रजी का यंत्र बनाकर दिया, एवं सम्पूर्ण विधि समझाकर शुभ आशीष स्वरूप् वाक्षेप प्रदान किया l वहां उपस्थित श्रावक-श्राविकाओ ने मयणा - उम्बरराणा को अपने घर लेजा कर स्वामीभक्ति की, साधर्मिक भक्ति करने से सम्यक्त्व निर्मल होता है । दोनों ने वही रहकर गुरुदेव की निश्रा में नवपदजी का पूजन, आयम्बिल तप, क्रिया सभी गुरु आज्ञानुसार विधिवत नौ दिनों तक पूर्ण किया l

आयम्बिल के प्रथम दिन से सकारात्मक परिणाम, नवमें 
दिन की आराधना पूर्ण होते होते.. उम्बरराणा के सभी तरह के रोग नष्ट होकर.. राणा एक तेजश्वी,  कांतिमय, राजकुमार श्रीपाल का रूप फिर से धारण कर लिया l

यह उनके द्वारा पूर्वभव में की गलतियों का उसी भव में आत्मिक  पश्चाताप और यहाँ शुद्ध भाव से जिनशासन के नौरत्नों की आराधना का ही नतीजा था l
 पुज्य जिनगुरुदेव की धर्म सभा.. एक धव्नि से जिनशासन महिमा, जैनम् जयति शासनम् और गुरुदेव के उपदेशों की जय-जयकार से गुंज उठी l

गुरुदेव और माँ का आशीर्वाद - श्रीपाल मयणासुंदरी दोनों तेजश्वी रूप और गुरूदेव का आशीर्वाद लेकर अपने घर पहुंचे, दोनों ने माँ के चरण-स्पर्श किये, माँ ने दोनों को गले लगाते हुए करुणामयी आशीर्वाद दिया, जिनवाणी के मार्गदर्शन को शाश्वत बताते हुए.. तह दिल से बहू का आभार व्यक्त किया, बहू ने भी ख़ुशी के आंसुओं के साथ माताजी के दुबारा चरण स्पर्श किये l

कल्याणमित्रों का भी उद्धार -  भवोंभव से जिनशासन की आराधना में रहे इस जोड़े ने अपने 700 कोढि साथियों को भी नवपद आराधना विधिवत करवाकर उनका भी रोग दूर कर निरोगी बना दिया यह है. कल्याण मित्र का फर्ज और मित्रता का फल l

अशुभकर्म से बहन रूपसुन्दरी बनी नृत्यांगना -वर्षो उपरांत एक दिन राजा प्रजापाल (मयणा के पिता) ने महाकाल राजा के स्वागत में कार्यक्रम रखा, उसमे श्रीपालराजा, मयणा को भी बुलाया गया, कार्यक्रम में नृत्य रखा गया और नृत्यांगनायें भी बुलाई गयी... नृत्य की शुरुआत हुई अशुभ कर्म करने और उनके उदय से उस नृत्यागनां की पहचान  मयणा की बहन रुपसुन्दरी के रूप में हुई, जब सभी को पता चला तब सूर सुन्दरी बहन मयणा के पैरो में गिरकर बहुत रोई, एवं अपनी पूरी व्यथा बताई, किस तरह वह बिककर वैश्यालय पहुँच गयी, अकथनीय कष्टों को भुगता, मयणा उसे  सांत्वना देकर घर लेकर गयी, सुरसुन्दरी भी पश्याताप करते हुए स्वकर्म को स्वीकार कर जिन आराधना में लग गयी l

राजा प्रजापाल को भी अपनी गलती का अहसास हुआ - उसने मयणा से कहा.. मैंने तुझे दुःखी करना चाहा.. तू सुखी बनी और सुरसुन्दरी को सुखी करना चाहा.. वह दुखी बनी l 

 प्रजापाल ने नतमस्तक होते हुए, भूल को स्वीकार कर माना कि में सर्वथा गलत था, यह असत्य है कि में किसी को सुखी या दुःखी कर सकता हूँ। वास्तव में कर्म सत्ताधीश है, राजा महाराजा प्रजा सभी कर्माधिन है.. यह सत्य मैंने प्रत्यक्ष देखा है l

श्रीपाल का महाराजा के रूप में राज्यभिषेक हुआ - उधर प्रजापाल राजा ने भी मालव देश के राज सिंहासन पर श्रीपाल का राज्य अभिषेक किया और स्वयं वैराग्य ग्रहण कर आत्म साधना के मार्ग पर अग्रसर हो गये l श्रीपाल राजा ने सुरसुन्दरी के पति अरिदमन को बुलाकर हाथी, घोड़े, जवेरात आदि के साथ शंखपुर का राज्य भी देकर विदा किया l उस समय के करीब 700 राजाओं ने प्रणाम कर श्रीपाल की आज्ञा को स्वीकारा l

 चारों ओर जिनधर्म जिनवाणी की जय जयकार होने लगी

 

जगत कृपालु महावीर परमात्मा ने गणधर गौतमस्वामीजी एवं श्रेणिक राजा की उपस्थिति में हुई देशना के अंतर्गत नवपद आराधना का सविस्तार वर्णन किया साथ ही श्रीपाल मयणा की नवपद आराधना का उल्लेख भी किया था l

यह चरित्र 15 वीं शताब्दी में श्री रत्नशेखर सूरीश्वरजी ने प्राकृत भाषा में पद्यमय निबद्ध किया,18 वीं शताब्दी में उपाध्याय श्री विनय विजयजी एवं यशो विजयजी म. ने श्रीपाल चरित्र रास का लेखन किया..  वर्तमान में इसी रास के आधार से ओलीजी के व्याख्यान हो रहे है। 

जगत उपकारी भगवन्त महावीर देशना...
उपकारी अरिहंत प्रभु, सिद्ध भजो भगवंत !
आचारज उव्झाय तिम, साधु सकल गुणवंत !!

अर्थ - अनंत उपकारी अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु भगवंतों की उपासना करों l

दरिसण दुर्लभ ज्ञान गुण, चारित्र तप सुविचार !
सिद्धचक्र ए सेवंता पामिजे भवपार 
अत्यंत दुर्लभ सम्यग् दर्शन-ज्ञान-चारित्र-तप का शुद्ध भावपूर्वक भजने से जीव भवसागर को पार कर लेता है।